Harish Jharia

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16 December 2009

eNovel: Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone) : Introduction

Patthar ki Ibaarat

Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2009 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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© Harish Jharia

उपन्यास: पत्थर की इबारत 

परिचय:

हज़ारों साल पहले की बात है जब आदमी ने आग का इस्तेमाल करना आरंभ किया था। फिर उसने धातुओं का इस्तेमाल करना शुरू किया। समय के साथ-साथ   कपड़ा बुनने में महारथ हासिल करने के लिये आदमी को शताब्दियों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। इस उपलब्धि के साथ दुनियां का नक्शा बहुत बदल चुका था। आदमी तब आदिमानव जैसा नहीं रहगया था। उसने अपनी जीवनशैली में बहुत प्रगति कर ली थी। उसने परिवार की संस्था की खोज कर ली थी और सगठित समाज में रहने की आदत डाल ली थी। कुछ सामाजिक नियम कायदे भी ईज़ाद कर लिये थे और उन नियमों को तोड़ने वालों के लिये दण्ड भी तय कर दिए थे। अगर कोई कमी थी तो बस यही कि तब तक कोई धर्म अस्तित्व में नहीं आ पाया था और ईश्वर की एंटिटी की व्याख्या नहीं हो पाई थी। आम आदमी के लिए कबीले का सरदार ही सबकुछ था। वही ईश्वर था, वही न्यायमूर्ति था और उसी की मर्ज़ी या हुक्म ही कानून था।

लोगों अपने-अपने अलग-अलग देवी देवताओं की खोज कर ली थी। ये देवी देवता अक्सर उनके अपने पुरखे होते थे या कोई प्रकृतिक आपदा जिसके भी द्वारा उन्होंने महाविनाश होते हुए देखा था या जिससे भी वे अक्सर आक्रांत हुआ करते थे। हर परिवार के अपने देवी देवता होते थे जिन्हें वे पीढ़ी दर पीढ़ी पूजा करते थे। किसी-किसी इलाके मे जहां मज़बूत कबीले हुआ करते थे और जिनके सरदार अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली होते थे वहां सरदार के द्वारा स्थापित विश्वास और नियम अपने आप लागू हो जाया करते थे और कबीले के लोग सरदार के पारिवारिक देवी देवताओं को ही अपने देवता स्वीकार कर लेते थे।

उस ज़माने में आम आदमी एक गुलाम से ज़्यादा और कुछ नही था। उसके पास बुनियादी अधिकार नहीं थे और ना ही उसे अपनी मरज़ी से कुछ भी करने की स्वतन्त्रता थी। वह पालतू जानवरों जैसा था जिसे कुछ भी करने से पहले सरदार या उसके मातहतों के हुक्म का इंतज़ार करना पड़ता था। उसका परिवार और परिवार के लोग भी सरदार और उसके गुर्गों की मेहरबानी पर जीते थे। ऐसी स्थिति में आम आदमी के जीवन का एक बड़ा भाग हुक्मरानों के अत्याचारों को सहने और उनसे बचने की कोशिशों में ही बीत जाता था।

वह एक ऐसा काल था जब आदमी का मूल पेशा ‘युद्ध’ था और वही व्यक्ति जीवन में सफलता प्राप्त कर पाता था जो  शारीरिक रूप से मज़बूत और युद्धकला में पारंगत होता था। तीर-कमान, छुरी, तलवार और कुल्हाड़ी उस ज़माने के आम हथियार हुआ करते थे। जिस किसी के पास ये हथियार और उन्हें इस्तेमाल करने के करतब मौजूद होते थे वही आम लोगों में विशिष्ठ स्थान बना पाता था और गुलामों की कतार से बाहर निकल कर कुछ विषेशाधिकार प्राप्त कर पाता था। 

ऐसे ही विरले लोगों में एक नवयुवक था परमा। परमा नाम उसके माता पिता ने उसे इसलिये दिया था क्योंकि वह पूर्णिमा के दूसरे दिन पैदा हुआ था। करीब अठारह वर्षीय परमा को लोग प्यार से चौहत्था भी कहकर छेड़ते थे क्योंकि उसकी ऊंचाई चार हाथ यानी छः फ़ुट थी और वह भीड़ में, अलग नज़र आता था। वह हट्टा-कट्टा था और हर तरह के हथियारों को चलाने में पारगत था। करीब पांच सौ लोगों के कबीले में वह ही अकेला ऐसा युवक था जिसकी मौजूदगी ही लोगों के मन और वहां के वातावरण में निर्भीकता पैदा कर देती थी।

आइए इस अठारह वर्षीय नवयुवक की जीवनी हम और आप साथ मिलकर लिखें…

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Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
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