Harish Jharia

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02 January 2010

eNovel:Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone): Episode- 2

Patthar ki Ibaarat

Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2010 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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उपन्यास: पत्थर की इबारत, एपीसोड- 2 

© Harish Jharia

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ… 

…… अंधकार धीरे-धीरे पेड़ों के नीचे सिमट गया। परमा ने शिकार को अपने दौनों कंधों पर लादा और मद्ध्म कदमों से शिकारगाह से वापस चल पड़ा……

और आगे……

सुबह का सूरज क्षितिज के ऊपर निकल अपनी संपूर्ण आभा के साथ दमक रहा था। भारी कदमों से आगे बढ़ रहे परमा के कंधों पर परिवार की गुज़र-बसर का सामान लदा हुआ था। बुदनी नदी के तट से उसका गांव बरगी नज़दीक ही था। इतना निकट कि गांव की सीमा पर बनी खेरमाई की मढ़िया से आवाज लगाओ तो नदी पर गए लोगों को सुनाई पड़ जाय। परमा ने सर उठाकर सामने देखा तो खेरमाई की मढ़िया नज़र आने लगी थी। गांव के लोग सुबह के निस्तार के लिए नदी की ओर जाने लगे थे।

जंगल के पेड़ों में रात गुज़ारने वाले पक्षियों के झुंड-के-झुंड पौ फटते ही नदी की ओर उड़ान भरने लगे थे। लाल मुंह वाले बंदर दबे पांव कबीले के रिहायशी इलाके की ओर इन्सानी भोज्य पदार्थों की तलाश में निकल पड़े थे। लोमड़ियां रात भर गांव और नदी के घाट के इर्द गिर्द जानवरों और आदमी के द्वारा छोड़े हुए शिकारों के अवशेषों से अपना पेट भरने बाद जंगल की घनी झाड़ियों छुपने के लिये इंसानी नज़रों से बचते हुए भागने लगी थीं। कबीले के कुत्ते जगह जगह बने घूरों की राख मे पड़े अलसा रहे थे और किसी के निकलने पर उसकी ओर लालच और संदेह के मिले-जुले भाव से एकटक सर घुमाते हुए उनके अदृष्य होने तक टकटकी लगाए देखते जाते थे। लोमड़ियों की आहट सुनते ही वे अकस्मात चौकन्ने हो जाते थे और झुंड के झुंड भौंकते हुए आक्रामक रूप से उनका पीछा करते थे और कबीले की सीमा पर विराजी खेरमाई के भी आगे तक उन्हें खदेड़ आते थे। फिर वापस आकर लम्बी जीभ निकालकर काफ़ी देर तक हांफ़ते रहते थे।

परमा इस चहल-पहल से अनजान अपनी दृष्टि कबीले की ओर टिकाए और हलका सा आगे की ओर झुका हुआ शिकार का वज़न कंधे पर साधे नपेतुले कदमों से अपने घर की ओर बढ़ा जा रहा था। कुछ ही क्षाणों में उसे अपना घर नज़र आने लगा था, जिसकी मिट्टी से बनी मोटी-मोटी दीवारें बाहर से गेरू से पुती हुई थीं। उनका गेरुआ रंग सुबह के उगते सूरज की रौशनी में दमक रहा था। घर का आकार बया के घोंसले की तरह गोल-गोल सा था। नीचे चौड़ा, ऊपर की ओर संकरा और भीतर जाने के लिए जमीन से करीब दो हाथ ऊपर एक अण्डाकार छेदनुमा दरवाज़ा था जिससे लांघते हुए भीतर प्रवेश करना होता था। ऐसा लगता था जैसे वह दरवाज़ा, वर्षा के पानी को भीतर घुसने से रोकने और जंगली जानवरों का प्रवेश असाध्य बनाने के लिये बनाया गया हो। दरवाज़े का आकार इतना छोटा था कि उससे होकर मुश्किल से एकबार मे एक ही आदमी भीतर प्रवेश कर सकता था। यह घर में रहने वालों की सुरक्षा सुदृढ़ करने के लिए एक बहुत ही कारगर तकनीक थी जो उस कबीले और जंगल में बसने वाले हर घर में इस्तेमाल की जाती थी।

घर की भीतरी दीवारें छुई से सफ़ेद रंग में पोती गई थीं जो भीतर चारों फैले अंधकार में भी देखने लायक उजाला समेट लाता था। इसी सफ़ेद छुई की पुताई अण्डाकार दर्वाज़े की किनारियों के गिर्द, बाहर तक फ़ैली हुई थी और दरवाज़े के आकार को स्पष्ट कर रही थी। घर की छप्पर घास और ताड़ के पत्तों से बनी हुई थी, जिसका ढाल सामने की ओर रखा गया था और छप्पर को थोड़ा सा आगे की ओर बढाकर अण्डाकार दरवाज़े के ऊपर एक परछी बना दी गई थी ताकि दरवाज़े से वर्षा का पानी और दोपहर की तीखी धूप भीतर प्रवेश नहीं कर सकें। उस बढी हुई परछी को लकड़ी की दो मज़बूत बल्लियों के ऊपरी छोरों के साथ कस कर तांत से बांधा गया था। ये लकड़ी के मलगे जमीन में दरवाज़े के आगे करीब एक हाथ की गहराई तक पत्थरों को धांसकर गाड़े गए थे। घर में प्रवेश करने पर इन खम्भों को पकड़कर ऊंचे प्रवेश द्वार को लांघने में सहारा लिया जाता था। यही कारण था कि खतरनाक जंगली जानवरों के लिए घर में घुसना असभव था।

घर के इर्द-गिर्द बबूल की कंटीली डालों की मज़बूत बाड़ लगी हुई थी जिसपर हरे पत्तों वाली फूलों और करेले की बेलें छाई हुई थीं। बेलों के घने पत्तो और पीले बैगनी फूलों ने खुश्क बबूल के कटीले पंजर को ढंक लिया था और बया के घौंसले जैसे खूबसूरत घर को एक रंगीन छटा प्रदान कर दी थी। बाड़ के भीतर चौतरफ़ा धरती हरी घास से ढंकी हुई थी। घर के दरवाज़े के ठीक सामने दो नीम के पेड़ थे। एक के नीचे पुसिया गाय बधी थी और दूसरे के नीचे रसोई के लिए दो पुरुष ऊंचा परछी वाला तीन ओर से खुला झौंपड़ा बना हुआ था। इस झौंपड़े के एक ओर एक पुरुष ऊंची बांस की टटिया लगी हुई थी ताकि उस ओर से बारिश का पानी और हवा के अंधड़ों से चूल्हे की आग और उसपर पक रहे भोजन का बचाव किया जा सके।

रसोई के एक ओर टटिया की तरफ़ तीन पत्थरों को पास-पास जमाकर चूल्हे जैसा आकार बनाया गया था जिसपर परिवार का भोजन तैयार किया जाता था। इस चूल्हे में रात दिन सूखे लक्क्ड़ ह्ल्के-हल्के सुलगते रहते थे। इन दो पेड़ों से कुछ हटकर एक बबूल का वृक्ष था जिसकी निचली डाल से एक रस्सा शिकार को लटकाने और साफ़ करने के लिए झूलता रहता था। नीचे ज़मीन पर एक बबूल का दो हाथ लंबा सूखा मोटा तना लंबाई में खड़ा कर नीचे गाड़ दिया गया था जिसकी ऊपरी सतह सपाट काटी हुई थी। इसी बबूल के सपाट सतह पर शिकार की कटाई-छटाई की जाती थी। टटिया से लगाकर भोजन पकाने की मिट्टी की हांडियां औंधी रखी हुई थीं और वहीं रखे हुए थे परोसने और खूरने के लिए लकड़ी की कड़छी और चटुआ। रोटी बनाने के लिये एक मिट्टी का कल्ला भी रखा हुआ था जिसे चूल्हे पर औंधा रखकर रोटियां सेकी जाती थीं ।

घर की पृष्ठभूमि में हरी घास और रगीन फूलों से छाई हुई एक छोटी पहाड़ी थी जो घर की खूबसूरती में चार चांद लगा रही थी। घर के एक ओर एक बड़ी चट्टान, कुछ भारी पत्थर और करौंदे की झाड़ियों के झुरमुट में पथरीली ज़मीन से फूटता निर्मल पानी का झरना बह रहा था। झाड़ी पर लाल-गुलाबी करौदे के गुच्छे लदे हुए थे और नीचे, सोते के ठीक मुहाने पर चार हाथ के घेरे वाले चौड़े गड्ढे की झिरिया में झरने का निर्मल पानी लबालब भरा रहता था। पानी इतना साफ़ था कि उसकी तलहटी की रेत एक हाथ गहरे जल से साफ़ नज़र आती रहती थी। झरने से अनवरत बहता पानी इस झिरिया की सतह के ऊपर से बहकर ज़मीन पर एक पतली सी धारा मे बहता हुआ आगे जाकर खेतों की जमीन पर फैलकर धरती मे समाता जा रहा था। इन्ही खेतों में एक ओर केले के लम्बे-लम्बे ऊँचे-ऊँचे पत्तों का विशाल झुंड सुबह की हल्की बयार में लहलहा रहा था। 

परमा ने बाड़ी पार करने के लिये अड़िया हटाया तो पुसिया गाय सर घुमाकर उस ओर देखने लगी और जोर-जोर से रम्भाने लगी। परमा के मुख पर बरबस एक हल्की सी मुस्कुराहट फैल गई। वह सीधा बबूल के पेड़ के नीचे पहुंचा और उसकी आड़ी मज़बूत डाल से झूलते रस्से से शिकार को लटका दिया ताकि वह अन्य वन्य जानवरों की पहुंच से बाहर रहे। उसने कमर से लटकती हुई कुल्हाड़ी को निकाला और नजदीक ही पड़े हुए भारी-भरकम सूखी लकड़ी के खड़े लट्ठे की छाल में उसका तेज़ धारदार फल धंसा दिया। धस्स्… की आवाज़ के साथ कुल्हाड़ी का फल लकड़ी मे एक अंगुल तक धंस गया और लकड़ी के लंबे हत्थे में कुछ पल तक कंपन होता रहा।

परमा को लकड़ी पर किए हुए अपने वार से संतोष हुआ और वह अपनी सफलता पर प्रसन्न होता हुआ कुल्हाड़ी के कांपते हुए हथ्थे की ओर देखता सीधा झिरिया पर पहुंच गया। झिरिया के निर्मल मधुर जल पर दृष्टि पड़ते ही उसने अपने होठों पर जीभ फेरी और जमीन पर उकड़ूं बैठ, हाथ से चुल्लू भर-भर कर झिरिया का पानी कई घूंट पी गया।

झिरिया से थोड़ा हटकर खरगोशों ने जमीन में लम्बे-लम्बे गहराई तक बिल बना रखे थे। वे बिल से बाहर निकलकर चारों ओर उगी हरी मुलायम घास कुतरते रहते थे। परमा को देख एक बड़ा सा खरगोश पिछले लम्बे पैरों से उछाल लगाता हुआ परमा के पास आ पहुंचा और उसके पैरों के लम्बे नुकीले नाखूनों से खेलने लगा। परमा ने उसके लम्बे-लम्बे कानों को पकड़कर उसे उठा लिया और अपनी मजबूत भारी भुजा में बिठा कर घर की ओर भागा। उसे भूख सी महसूस होने लगी थी और मन में आठ वर्षीया बहन ‘बिन्नी’ और माँ ‘नौनी’ का खयाल आने लगा था जो उसे सुबह-सवेरे रात की बासी ज्वार की रोटी का कलेवा कराती थीं। 

… रोटी का खयाल आते ही उसकी भूख एकाएक भड़क उठी और पलक झपकते ही परमा नीम के वृक्ष पर चढ़ गया और और दूसरे ही क्षण वह मुंह में नीम की दातून चबाता हुआ नीचे उतर आया।
        
नीम से उतरकर उसे अभी कुछ ही पल गुज़रे होंगे कि पास ही सूखी झाड़ियों में खरखराहट सुन कर वह चौकन्ना हो गया। वह चीते की फुर्ती से उछला और दातून को एक ओर फेक कर एक पल में लपक कर लकड़ी के लट्ठे से कुल्हाड़ी उखाड़ कर झाड़ियों की तरफ़ भागा। उसे किसी जंगली जानवर के होने की आशंका हुई, जिससे पुसिया गाय या ताज़ा शिकार के लिए खतरा हो सकता था। उसने दाहिने हाथ में कुल्हाड़ी को पकड़ा और आक्रामक मुद्रा में सधे हुए कदमों से शत्रु पर आक्रमण करने के लिये तेज़ी से बढ़ा।

उसके आक्रामक तेवर कुछ क्षण ही चल पाए थे कि तभी उसकी नज़र अपने पिता कोदू पर पड़ी, जो जलाने के लिए सूखी लकड़ियां काट रहा था। क्षणभर में ही उसका सारा आक्रामक तेवर शांत हो गया। उसने अपनी हमलावर मुद्रा से बाहर आने के लिए अपनी कमर और गरदन को सीधा किया, आंखों और भवों के तनाव को शांत किया और दाहिने हाथ की मुट्ठी में आक्रमण के लिये तत्पर कुल्हाड़ी को ढीला छोड़कर नीचे झूल जाने दिया। वह सीधा निश्चल खड़ा हो गया और बांए हाथ के लबे-लंबे नाखूनों से अपने उलझे बालों की लटों को सुलझाने लगा।

परमा का पिता कोदू उससे भी से भी कहीं ऊंची कदकाठी का हृष्ठ्पुष्ठ विशालकाय पुरुष था। उसकी वेषभूशा हू-ब-हू अपने बेटे के जैसी ही थी। पैंतीस वर्षीय कोदू के चेहरे पर बिरली डाढीमूँछ थी। इसके अलावा उन दौनों के चेहरे भी करीब-करीब एक जैसे ही थे। कोदू ने परमा के आने की आहट सुन पलटकर परमा की ओर देखा और कहा:
- का है रे…
- कछू नईं बीर… मोहे लगो कि तेंदुआ घुसो है… परमा ने सफ़ाई दी और आगे बोला:
- ए बीर! तैं सिकार सफा कर लै; मैं लकड़िएं लात हौं…
- तैं तो बड़ी जल्दी सिकार लै आओ रे…?
- हओ रे बीर…! मिल गई हती सो लै आओ…

कोदू ने अपने बेटे की ओर गर्वपूर्ण नज़ोरों से देखा, अपनी कुल्हाड़ी को कमर पर कसे पट्टे से लटका लिया और बबूल की डाल से झूलते शिकार की ओर बढ़ गया। वह इस बात को भली भाँति जनता था कि शिकार को शीघ्र ही साफ़ करना आवश्यक था क्योंकि तब तक जाड़े के दिन शुरू नहीं हुए थे। बरगी गांव में कबीले के लोगों ने यह आम सहमति बना ली थी कि किसी भी परिवार के द्वारा किये गए शिकार को कम से कम पाँच परिवारों मे बराबर-बराबर बांट लिया जाना चाहिए; ताकि भोजन की व्यर्थ बरबादी न हो और जानवरों का व्यर्थ शिकार ना किया जा सके। शिकार से प्राप्त खाल को भी सावधानी पूर्वक निकालने, उसको पकाने-सुखाने और फ़िर उसे आदमी के नित्य उपयोग में लाने के सख्त निर्देश थे। कोदू लम्बे-लम्बे कदम रखता हुआ बबूल तक पहुंच गया और उसने अपनी कमर पर कसे पट्टे से तेज़ धारदार छुरी को निकल लिया।

परमा ने रसोई के लिए पर्याप्त सूखी लकड़ियां काटकर इकट्ठा कीं, उनको घास की रस्सी से बांधा और उस गट्ठर को घसीटकर घर के निकट ले गया। तब तक उसके पिता ने शिकार की सफ़ाई कर ली थी और उसके पांच हिस्से बनाकर हरेक को ताज़ा हरे केले के पत्तों में लपेट लिया था। परमा को देखते ही कोदू ने कहा:
- लै रे! जे पकड़ चार हिस्सा अउर पड़ौसियन हे दै आ।
- हओ रे बीर! अभई जाउत हों…

कहकर उसने केले के पतों में लिपटा भोजन एक बांस कि टोकरी मे रख लिया और पलटर घर के अण्डाकार दरवाज़े की ओर देखने लगा। उसे कसकर भूख लग आई थी और वह प्रतीक्षा कर रहा था कि कब उसकी माई ‘नौनी’ उसे आवाज़ दे या बहन ‘बिन्नी’ हाथ में बासी रोटी, नमक की गड़िया और प्याज की गांठ लेकर भागती हुई आ जाए।

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शेष अगले अंक में क्रमशः …
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Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
Opening Page:  Preface:  Introduction:  Episode-1:  Episode-2:  Episode-3:  Episode-4:  Episode-5:  Episode-6:  Episode-7:  Episode-8:  Episode-9: Episode-10: : Episode-11: Episode-12: Episode-13; Episode-14  
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Synonyms of Hindi words: 
शिकार= prey; आभा= splendor; खेरमाई= goddess of village territory; मढ़िया= small temple; छप्पर= roof; ताड़= palm; ढाल= slope; परछी= shed; बल्लियों, मलगे = wooden logs; धांसकर= rammed into; खम्भों= pillars; करेले- bitter gourd; बेलें= creeper; पंजर= skeleton; झौंपड़ा= thatched hut; बांस= bamboo; टटिया= bamboo-mesh; अंधड़ों= strong wind; परोसने= serving food; खूरने= stir; कड़छी= serving spoon; चटुआ= wooden spatula; कल्ला= earthen pan; पृष्ठभूमि= background; पहाड़ी= hill; झरना= spring; सोते= cascade; बया= Indian tailor bird; अड़िया= wooden-log barrior, लोमड़ियां= fox
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Caution: This creative work has been originally written by the author Harish Jharia who is the sole owner of the text and this intellectual property. This has been published on the personal Blog “Discover Life” of Harish Jharia at the URL: http://harishjhariasblog.blogspot.com/. No hyperlink to this novel “Patthar ki Ibaarat” (Script of Stone) has been provided nor any permission granted to any person, organization or site whomsoever, by the writer and owner of the copyright of this novel that is Harish Jharia. This novel has been published on the blog “Discover Life” for the visitors to this blog for their healthy reading and intellectual entertainment. The novel in whole, in part or as extracts should not be copied and or reproduced neither on internet, nor written on CDs nor printed on books, magazines newspapers and or in any media. 
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Disclaimer: This article / Story / fiction is written based on my personal observations. My intention for publishing the same is to provide healthy reading and intellectual entertainment and not for educating the visitors. Names of people, societies, communities and description of faiths, beliefs, incidents are imaginary and fictitious. They have neither any relevance to the prevailing entities and traditions nor have any similarities with ongoing lifestyles, political ideologies and legal doctrines. The contents of this creative work have not been written with any intention to criticize, condemn or oppose anything what-so-ever present in reality in any country in the world. No literature or authentic books have been referred for writing the contents of this article. The visitors are advised not to refer the contents of this article for any research or testimony on scientific, geographical, political, civic, social or legal purposes. The visitors are further advised to consult relevant experts before adapting any information from this article. The author or the website are not responsible for any errors, mistakes, or omissions there in.
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