Harish Jharia

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23 January 2010

eNovel:Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone): Episode- 3


Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2010 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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उपन्यास: पत्थर की इबारत, एपीसोड- 3

© Harish Jharia

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ…

 कहकर उसने केले के पत्तों में लिपटा भोजन एक बांस की टोकरी मे रख लिया और पलटर घर के अण्डाकार दरवाज़े की ओर देखने लगा। उसे कसकर भूख लग आई थी और वह प्रतीक्षा कर रहा था कि कब उसकी माई ‘नौनी’ उसे आवाज़ दे या बहन ‘बिन्नी’ हाथ में बासी रोटी, नमक की गड़िया और प्याज की गांठ लेकर भागती हुई आ जाए…

और आगे…

वर्षाकाल के ठीक बाद की हरियाली चारों ओर फ़ैली हुई थी। गौरैया चिड़ियों का एक झुंड झिरिया के किनारों पर उतरकर पानी पी रहा था। उनके चहचहाने की महीन और मधुर आवाज़ सुन एक पल के लिए परमा ने उस तरफ़ देखा तभी उसके कानों में माई की आवाज़ आई:

- ए…ए…ए… परमू! कहाँ जा रहो है रे…? कलेबा तो कर लै।

परमा ने पलट कर माई की ओर देखा। उसकी माई नौनी अपनी बेटी बिन्नी के साथ बाड़ी पर लगा भारी अड़िया हटाकर घर के परकोटे में प्रवेश कर रही थी। नौनी का कद आम औरतों से कहीं ऊँचा था। एक सम्पूर्ण नारी की गरिमा, कोमलता और  सुंदर सुघड़ काया के साथ शक्तिशाली, पुष्ट और चपल शरीर ने उसकी चाल में एक अविश्वसनीय आकर्षण पैदा कर दिया था। वह लम्बे-लम्बे डग भरती हुई अपने इकलौते बेटे की ओर तेज़ी से बढ़ती आ रही थी और बेटी बिन्नी उसकी चाल को मिलाने के लिए उसके आगे-आगे दौड़ रही थी।

नौनी के कमर तक लंबे बाल नदी से नहाकर लौटने तक कुछ-कुछ भीगे-भीगे से थे। बालों की एक लट उसकी बड़ी-बड़ी आँखों के आगे से झूलती हुई एक गाल पर चिपक गई थी। उसके लंबे-लंबे बाल सुबह की बयार में कधों के आगे तक बिखर रहे थे। पलकों की लंबी-लंबी बिरौनियां आंख झपकने के साथ हर बार पर ऊंची कमान सी भवों को छू लेती थीं।  वह बार-बार बालों की लटों को एक हाथ से अपने कानों के पीछे दबाने कि असफल कोशिश कर रही थी। दूसरे हाथ में उसने बांस की एक टोकरी में धुले हुए भीगे कपड़े कोहनी से दबाए हुए थे। शरीर के ऊपरी भाग को उसने सूती कपड़े से ढंका हुआ था। नौनी ने एक लंबे अंगोछे के दौनों छोरों को गरदन के पीछे से बराबर दो भागों में आगे की ओर लाकर बाईं ओर का छोर दाहिनी ओर और दाहिनी ओर का बाईं ओर ले जाते हुए अंगोछे के दौनों छोरों को कमर पर पीछे की ओर एक बड़ी सी सरफूंद में बांध दिया था। इस प्रकार नौनी ने एक सूती अंगोछे को एक खूबसूरत चोली का आकार दे दिया था।

नौनी ने कमर से लेकर घुटनों तक एक अलग सूती धोती कांच लगाकर कस कर बांधी हुई थी। धोती के ऊपर चमड़े के पट्टे का कमरबंध कसा हुआ था जिसमें एक ओर तेज छुरी और हंसिया खुसा हुआ था और दूसरी ओर एक हल्की कुल्हाड़ी का लंबा हत्था लटक रहा था। हाथ और पैर की उंगलियों में डेढ़ अंगुल लंबे सख्त, मजबूत और नुकीले नाखून थे और पैर के पंजे और तलवे सख्त और मोटी त्वचा से ढके हुए थे। कुल मिलाकर नौनी भी अपने पति और बेटे की तरह एक सम्पूर्ण शिकारी योद्धा ही थी जिसमें अपनी सुरक्षा करने के लिए चौकन्नापन और शत्रु से आकस्मिक युद्ध और आक्रमण करने के लिए शारीरिक योग्यताएं, युद्धकलाएं, चपलता और साहस मौजूद थे।

नौनी अच्छी तरह जानती थी कि सूरज निकलने से पहले ही उसका बेटा शिकार पर निकल गया था। अब तक पहली पहर का सूरज काफ़ी ऊपर तक आ चुका था और माई  को इस बात का एहसास हो रहा था कि उसके बेटे को अवश्य ही जोर की भूख लग आई होगी। उसके चेहरे पर ममता पूर्ण संवेदना झलक आई और उसने परमा के पास जाकर उसके गाल पर अपना हाथ रख दिया और कहा:
- काए रे परमा …! भूँको है का…?
- हओ री माई… कह कर उसने बहन बिन्नी के सर पर हाथ रख उसके बालों को सहलाने लगा।
माई ने बिन्नी से कहा:
- एरी मोड़ी…! जा तो बारी में सें एकाध मिर्ची टोड़ ला। मैं तोरे दद्दा के लाने रोटी लै कें आत हौं।

कहकर नौनी ने हाथ की टोकरी नीचे पर रखी और एक पल में, लबे-लंबे डग भरती हुई, घर के अण्डाकार दरवाजे पर पहुंच गई। उसने परछी के खंभे को हाथों से जकड़ कर पकड़ा और दौनों पैरों को एक साथ हवा में उछाल कर दरवाजे के भीतर कूद गई। 

भीतर से घर का आकार गोलाकार था जो करीब बीस हाथ चौड़े व्यास में फैला हुआ था। घर के बीचों-बीच आदमी की जंघा बराबर मोटा सगौना का मजबूत खंभा गड़ा हुआ था जिसके ऊपरी छोर पर घर के छप्पर का पूरा भार टिका हुआ था। तीन-चार हाथ मोटी, बारह हाथ ऊंची छुई से पुती सफ़ेददीवारों के ऊपर एक हाथ ऊंचा रोशनदान हवा और प्रकाश आने के लिए चारों ओर छोड़ दिया गया था। उसके ऊपर खड़े मलगों के छोरों पर घास और ताड़ के डक्खों का छप्पर टिका हुआ था। गोलाकार दीवार पर चारों ओर जानवरों की फ़रवाली खालें लकड़ी की खूँटियों से लटकी हुई थीं। एक ओर छप्पर के मलगों से रस्सियों के सहारे झूलती लकड़ी की मचान पर भाले, तलवार, पाठल और गँड़ासे आदि हथियार करीने से सहेजकर रखे हुए थे।

घर का कच्ची मिट्टी का फ़र्श कूट-पीट और घिस कर चिकना, कठोर, मजबूत और सीलन अवरोधक बनाया गया था। आधे के करीब फ़र्श पर परिवार के सोने के लिए करीने से पेंयार फैलाई गई थी और उसपर जानवरों की मुलायम खाल बिछाई हुई थी। घर के दूसरे छोर पर हाथ की बनाई हुई मिट्टी की चार कुठियाँ  थीं जिनमें अनाज भरा हुआ था। उन्हीं के नज़दीक मिट्टी के काले बर्तन, हंड़िया, परैया, पैना, कल्ला आदि रखे हुए और एक रस्सी से सींका झूल रहा था जिसमें रखी परैया में रात की बासी रोटी रखी हुई थीं।

नौनी ने सींके से एक ज्वार की रोटी निकाली, उसी पर एक प्याज की गाँठ और छोटी सी नमक की डलिया रख ली और उसे लेकर अण्डाकार दरवाज़े से बाहर आ गई। घर की बाहरी दीवार से टिक कर परमा बैठा हुआ कलेवा की प्रतीक्षा कर रहा था। बिन्नी हाथ में एक हरी मिर्च पकड़े परमा से टिक कर खड़ी थी और दरवाजे की ओर देख रही थी। माई को देखते ही वह दौड़कर उसके पास आई और उसके हाथ से रोटी लेकर अपने दद्दा के पास आई और कलेवा उसके हाथ पर रख दिया। फ़िर अलग से हरी मिर्ची भैया के हाथों में थमाई और बोली:
- काए रे दद्दा…! तैं भूँको हतो ना…?
- हओ री मोड़ी…! भूँक तो लगी है मोहे… आ जा तैं बी एकाध कौंरा खा ले… कहता हुआ परमा कलेवा करने लगा।

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शेष अगले अंक में क्रमश…
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Synonyms of Hindi words:
संवेदना= compassion; मोड़ी= small girl;  अण्डाकार= oval; परछी= shed; खंभे= pillars; व्यास= diameter; जंघा= thy;  सगौना= Teak wood;  डक्खों= palm leaf;  खालें= tanned leather;  खुटियों= wooden pegs; मचान= elevated wooden platform; भाले= speer;  तलवार= sword; पाठल= heavy chopper, गँड़ासे= grass chopper; पेंयार= dried paddy plants; कुठियां= urns for grains; हंड़िया= terracota pan; परैया= terracota lid; पैना= Terracota pot with a hole in the bottom;  कल्ला= terracota hot plate; सींका: hanging shelf; बासी= food cooked previous day; चपल= swift; सुघड़= beautifully formed; कद= height; आकर्षण= attraction; सुघड़= beautifully formed; चपल= swift; परकोटे= boundry; माई= mom; कलेबा= breakfast; महीन और मधुर= Soft and sweet; गौरैया= sparrow  ; टोकरी= bamboo tray ; केले के पत्तों= banana leaf; गांठ= knot : गड़िया: cryatal  ;शिकार= prey; आभा= splendor; खेरमाई= goddess of village territory; मढ़िया= small temple; छप्पर= roof; ताड़= palm; ढाल= slope; परछी= shed; बल्लियों, मलगे = wooden logs; धांसकर= rammed into; खम्भों= pillars; करेले- bitter gourd; बेलें= creeper; पंजर= skeleton; झौंपड़ा= thatched hut; बांस= bamboo; टटिया= bamboo-mesh; अंधड़ों= strong wind; परोसने= serving food; खूरने= stir; कड़छी= serving spoon; चटुआ= wooden spatula; कल्ला= earthen pan; पृष्ठभूमि= background; पहाड़ी= hill; झरना= spring; सोते= cascade; बया= Indian tailor bird; अड़िया= wooden-log barrior, लोमड़ियां= fox; बबूल= Egyptian thorn, prickly acacia
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Caution:
This creative work has been originally written by the author Harish Jharia who is the sole owner of the text and this intellectual property. This has been published on the personal Blog “Discover Life” of Harish Jharia at the URL: http://harishjhariasblog.blogspot.com/. No hyperlink to this novel “Patthar ki Ibaarat” (Script of Stone) has been provided nor any permission granted to any person, organization or site whomsoever, by the writer and owner of the copyright of this novel that is Harish Jharia. This novel has been published on the blog “Discover Life” for the visitors to this blog for their healthy reading and intellectual entertainment. The novel in whole, in part or as extracts should not be copied and or reproduced neither on internet, nor written on CDs nor printed on books, magazines newspapers and or in any media. - Harish Jharia
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Disclaimer:
This is a work of fiction and all the characters, story, incidents, culture, social life, evolution, developments etc are all imaginary.  This article / Story / fiction is written based on my personal observations and imagination. My intention for publishing the same is to provide healthy reading and intellectual entertainment and not for educating the visitors. Names of people, societies, communities and description of faiths, beliefs, incidents are imaginary and fictitious. They have neither any relevance to the prevailing entities and traditions nor have any similarities with ongoing lifestyles, political ideologies and legal doctrines. The contents of this creative work have not been written with any intention to criticize, condemn or oppose anything what-so-ever present in reality in any country in the world. No literature or authentic books have been referred for writing the contents of this article. The visitors are advised not to refer the contents of this article for any research or testimony on scientific, geographical, political, civic, social or legal purposes. The visitors are further advised to consult relevant experts before adapting any information from this article. The author or the website are not responsible for any errors, mistakes, or omissions there in.
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