Harish Jharia

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29 January 2010

eNovel:Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone): Episode- 4

Patthar ki Ibaarat cropped

Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2010 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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उपन्यास: पत्थर की इबारत: एपीसोड- 4

© Harish Jharia

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ…

… बिन्नी हाथ में एक हरी मिर्च पकड़े परमा से टिक कर खड़ी थी और मां की प्रतीक्षा में दरवाजे की ओर देख रही थी। मां को आता देखते ही वह दौड़ कर उसके पास आई और उसके हाथ से रोटी लेकर अपने भाई के पास आ पहुँची और कलेवा उसके हाथ पर रख दिया। फ़िर अलग से हरी मिर्ची भैया के हाथों में थमाई और बोली:
- काए रे दद्दा…! तैं भूँको हतो ना…?
- हओ री मोड़ी…! भूँक तो लगी है मोहे… आ जा तैं बी एकाध कौंरा खा ले… कहता हुआ परमा कलेवा करने लगा…

और आगे…

उसे जोर की भूख लगी थी; उसने अपना कमर-पट्टा हथियारों समेत उतारकर जमीन पर रख दिया,  दीवार से टिकिकर उकड़ूं बैठ गया और एक के बाद एक, रोटी के कई कौर खा गया।

बिन्नी बोली:
-अरे दद्दा तैं तो खुदई खात जा रहो है… मोहे भूल गओ का…?
परमा के मुँह में रोटी का कौंर अभी भी भरा हुआ था। उसने रोटी चबाते हुए ही एक कौर बिन्न्नी को भी खिला दिया और उससे बोला:
लै री बिन्नी… पकड़ तो जा रोटी… मैं तनक झिरिया में पानी पी आऊँ। कितनी चिरपिरी मिर्ची खबा दई री तैने…।
यह कहकर उसने रोटी बिन्नी के हाथों में रख, लपक कर झिरिया पर पहुँच गया और चुल्लू भर-भर कर पानी पीने लगा।   

बिन्नी कटोरे के आकार की गहरी और मोटी ज्वार की रोटी को हाथों की अंजली बना कर रखे रही, जिसमें प्याज, हरी मिर्च और नमक की छोटी सी गड़िया रखी थी। बिन्नी को अपने भाई का साथ बड़ा अच्छा लगता था। दद्दा का कलेवा अपने हाथ में थामे हुए उसे एक अलौकिक सी अनुभूति हुआ करती थी। हर समय उसे भाई के नज़दीक रहने और उससे चिपटकर बैठने की इच्छा होती रहती थी। उसके अंतर्मन में ऐसे ही कुछ भाव आ जा रहे थे जो उसके बाल मन की समझ से बाहर थे। वह हाथ में रोटी थामे एक टक अपने भाई परमा की ओर देख रही थी… कि कब वह पानी पीकर वापस उसके पास आकर बैठ जाए और कलेवा कर ले।

तभी परमा वापस आ गया और फिर से उसी जगह जमीन पर दीवार से टिककर उकड़ूँ बैठ गया। उसने रोटी बिन्नी से ली तो बिन्नी भी उसकी बाईं भुजा को दौनो हाथों में पकड़ उससे सटकर पालथी मारकर वहीं नीचे बैठ गई। उसने अपना गाल भाई की शक्तिशाली भुजा पर टिका लिया और दूर आसमान के शून्य में निहारने लगी।

माँ बबूल के नीचे खड़ैरा से झाड़ रही थी। उसने शिकार के अवशेषों को एक बड़ी सी टोकरी में भरा और जंगल की ओर फैंकने के लिए बाड़ी के बाहर निकल गई। वह जाते-जाते परमा को आवाज भी लगाते हुए गई:
- ए रे मोड़ा…! सिकार के चारै हिस्सा कबीले के पड़ौसियों के घरों तक पहुंचा दैए… भूलिए नै रे…

माँ के जाने तक परमा का कलेवा हो चुका था। परमा के पिता कोदू नदी की तरफ़ निस्तार के लिए निकल गए थे। परमा उठ कर खड़ा हुआ, उसने दुबारा झिरिया पर जाकर पानी पिया और हाथ-मुंह धोकर वापस बिन्नी पास आकर रुका तो बिन्नी ने उसका कमर-पट्टा उठाकर उसे पकड़ा दिया। पट्टा बांधते हुए परमा नज़दीक खड़ी बिन्नी की ओर ध्यान से देखते हुए विचारमग्न हो गया।

उसे इस बात की चिन्ता सताने लगी कि उसके घर से बाहर निकलने के बाद बिन्नी घर में अकेली रह जायगी। वह बिजली की गति से घर के भीतर गया और बिन्नी का चमड़े का पट्टा, छुरी, हंसिया और नन्हीं सी कुल्हाड़ी लेकर बाहर आ गया। उसने बिन्नी की कमर में पट्टा कसा और उसे छोटे- छोटे हथियारों से लैस कर दिया।

बिन्नी को अपनी मां की तरह शिकारियों और योद्धाओं जैसा शस्त्रों से लैस होना बड़ा अच्छा लगता था। उसने शस्त्रों को धारण करने के बाद अपनी मां की ही तरह कमर सीधी कर आक्रामक मुद्रा बनाने का अभिनय करने लगी। उसका आत्मविश्वास देख कर परमा को संतोष हुआ और उसने शिकार के हिस्से वाली टोकरी उठा ली और बाड़ी के बाहर निकलने के लिए अड़िया की ओर तेजी से बढ़ गया।

बिन्नी अपने भाई को बाड़ी के पीछे अदृष्य होने तक देखती रही और जैसे ही वह आँखों से ओझल हुआ वह फ़ुर्ती से नीम के वृक्ष पर जा चढ़ी जहाँ से बाड़ी के बाहर का विहंगम दृष्य नज़र आता था और कबीले के करीब पच्चीस-तीस घरों की बाड़ियाँ नज़र आती थीं। उसे अपनी दाहिनी ओर खेरमाई की मढ़िया और उसके आगे नदी का घाट दिख रहा था। घाट के दौनों ओर सागौन, खैर, आँवला, आम, जामुन और कीकर-बबूल आदि के सैकड़ों पेड़ खड़े थे जिनके नीचे घनी झाड़ियों और खर-पतवार का सघन जाल फैला हुआ था।

वह पूरा इलाका विन्ध्याचल पर्वत श्रंखलाओं के पूर्वी छोर पर फ़ैले बियाबान जंगलों का एक हिस्सा था, जिसमें लगभग दस-बारह एकड़ के सपाट समतल क्षेत्र में जंगल को साफ़ करके इस कबीले ने नदी के किनारे उपजाऊ जमीन पर अपने बसने के लिए वर्षों पूर्व इस गाँव की स्थापना की थी। बिन्नी की नज़रें लगातार अपने भाई का पीछा कर रही थीं जो एक के बाद एक पड़ौसी घरों में जाकर भोजन वितरित कर रहा था।

परमा ने चौथे और अंतिम घर में भोजन पहुंचाने के बाद ही चैन की साँस ली क्योंकि जहां एक ओर यह कार्य सामाजिक सहयोग और संवेदना बनाए रखने के लिए उपयोगी था वहीं दूसरी ओर यह कबीले के कानून के अंतर्गत भी आता था, जिसकी अवहेलना करने पर कबीले का सरदार और वहां की पंचायत दोषी परिवार के लिए शिकार करने पर प्रतिबंध लगा देते थे। कबीले के लोगों ने वर्षों के अनुभवों के आधार पर यह सीखा था कि जहां एक ओर उनके जीवित रहने के लिए शिकार करना आवश्यक था वहीं दूसरी ओर वन्य जीवन की रक्षा करना भी उनके अस्तित्व के लिए उतना ही ज़रूरी था। यह सब सोचता हुआ परमा अपनी बाड़ी की ओर वापस आ ही रहा था कि तभी उसे हिरन के बच्चे की चीत्कार की आवाज सुनाई दी।

बियाबान जंगल की सुबह के पहले पहर के शांत और निस्तब्ध वातावरण में किसी मृग-शावक का वेदनापूर्ण आर्तनाद जंगल के गगनचुंबी वृक्षों के डाल-पत्तों से प्रतिध्वनित होकर पूरे कबीले के लोगों के कानों को आंदोलित कर गया। पेड़ों पर बैठे हज़ारों पक्षी आतंकित होकर, तीखी आवाज़ें करते हुए और पत्तों से टकराते फड़फड़ाते हुए एक
साथ आकाश में बादलों की भांति छा गए।

परमा घटनास्थल के सबसे नज़दीक मौजूद था और स्वाभाविक रूप से उसी पर इस भयावह दुर्घटना का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा। उसके भीतर छुपा हुआ योद्धा और क्रूर शिकारी एकाएक बाहर आ गया और उसके व्यक्तित्व पर छा गया। पल भर में परमा का चेहरा क्रोध से तमतामाने लगा। उसके शरीर में बिजली सी फ़ुर्ती आ गई और उसका पूरा शरीर शिकारियों की आक्रामक मुद्रा में आ गया। उसके बाँए हाथ की मुट्ठी में भारी-भरकम बांस का धनुष मज़बूती से जकड़ गया और दाहिने हाथ में बैंत का सबसे भारी तीर पीठ पर बंधे तरकश से निकल कर आ गया। 

वह तेज़ी के साथ घायल हिरन की आवाज़ का पीछा करता हुआ घटनास्थल की ओर बढ़ने लगा। उसे संदेह हो रहा था कि किसी तेंदुआ ने हिरन के बच्चे को पकड़ रखा है। उसने स्वयं को उस तेंदुए को निशाना बनाने और उसके चंगुल से शावक को बचाने के लिए पूर्ण रूप से तैयार कर लिया। उसे कुछ पेड़ों के बीच की झाड़ियों के पीछे से सूखे पत्तों पर घायल हिरन के फड़फड़ाने से पैदा हुई, डालों के टूटने और पत्तों के कुचले जाने की आवाज़ आई। परमा के सर, गरदन और आंखे त्वरित गति से घायल हिरन और आक्रामक तेंदुए को खोज में झटके के साथ दाहिने-बाएँ घूमती जा रही थीं।  

उसने अपने कमान पर तीर चढा लिया था और उसे आधा खींच कर सर, गरदन और आंखों के साथ-साथ धनुष को दाहिने-बांए घुमाने लगा था ताकि तेंदुए पर निशाना साधते ही प्रत्यंचा को कानों तक खींच कर तीर छोड़ दे और मृग शावक की जान बचा ले। उसके पैर अपने रास्ते पर चल रहे थे और कमर से ऊपर का पूरा धड़ धनुष के साथ-साथ घूमता जा रहा था। वह नपे-तुले कदमों से तड़पते हुए मृग की ओर बढ़ा। 

हिरन का फड़फड़ाना जारी था और जैसे-जैसे घायल हिरन की आकृति उसकी नज़रों में स्पष्ट होती जा रही थी वैसे-वैसे परमा का चौकन्नापन कम होता जा रहा था। उसे अनुभव होने लगा था कि वह घटना तेंदुए के आक्रमण की नहीं बल्कि कोई अलग प्रकार की दुर्घटना थी। उसने अपने तीर-कमान नीचे कर लिए और दौड़कर घायल हिरन के पास दो तीन छलांगों में पहुंच गया। उसे यह देखकर हैरानी हुई और क्रोध से उसका चेहरा तमतमा गया कि किसी ने अधिक से अधिक दो माह के मृग शावक के दाहिने पुट्ठे पर एक तीर मार दिया था। 

परमा ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर कबीले वालों को आवाज़ लगाई:
- अरे ए… कबीले वालो… दौड़ो… दौड़ो… मिरगा के बच्चा हे मार दओ… मार दओ रे…
उसकी यह पुकार जिसने भी सुनी वह भी यही पुकार लगाने लगा…
- मिरगा के बच्चा हे मार दओ… मार दओ रे…

कुछ ही क्षणों में चारों ओर से यही आवाज़ें आने लगीं। कई लोग ढपले लेकर आ गए और ज़ोर-ज़ोर से ढोल की तरह पीटने लगे। कुछ ही पल में कबीले के लगभग पाँच सौ स्त्री-पुरुष और बच्चे घायल हिरन को घेर कर खड़े हो गए। ढपलों की आवाज़ें लगातार आ रही थीं और वहां मौजूद लोग भी वही पुकार लगाते जा रहे थे
- “मिरगा के बच्चा हे मार दओ… मार दओ रे…”।

इस बीच परमा ने मृग के शरीर से तीर निकाल लिया और उसके घाव को आस-पास के जंगल की झाड़ियों से जड़ी-बूटियां लाकर पत्तों और लताओं की सहायता से बाँध दिया था। घयल हिरन अविचल ज़मीन पर पड़ा हुआ था और उसके घायल पैर में रह-रह कर कंपन हो रहा था। घाव अधिक गहरा नहीं था पर कबीले के किसी निवासी ने हिरन के बच्चे पर बेवजह  हमला करने का जघन्य अपराध कर दिया था जिसकी सज़ा भी उतनी ही कड़ी हो सकती थी जितनी किसी आदमी पर जानलेवा हमला करने की हुआ करती थी। 

कबीले वालों को ढपले पीटना और पुकार लगाना तब तक जारी रखना आवश्यक था जब तक कि कबीले का सरदार घटनास्थल पर नहीं पहुंच जाता, और घायल जानवर का मुआयना नहीं कर लेता। सरदार के आने तक घटनास्थल से सभी बच्चों को दूर भेज देना भी आवश्यक था; क्योंकि कभी-कभी सरदार घटनास्थल पर ही हिंसक सज़ाएं दे दिया करता था जिन्हें देखकर बच्चों का मानसिक संतुलन बिगड़ने की पूरी संभावना हुआ करती थी। सरदार के आने तक यदि अपराधी को उसके सामने पेश करने के लिए पकड़कर तैयार रखा जाता था तो सरदार खुश होता था। किंतु अगर तब तक अपराधी नहीं पकड़ा जाता तो सरदार घटनास्थल पर मौजूद लड़ाकों में से किसी भी व्यक्ति को भी सज़ा सुना सकता था।

परंतु इसके बावजूद सबसे भयानक सजा दी जाती थी उस अपराधी को जो सरदार के घटनास्थल पर पहुंचने से पहले स्वयं को वहां मौजूद लड़ाकों के हवाले नहीं किया करता था। परमा का पिता कोदू सरदार के लड़ाकों में से एक था, जो वहां परमा की पहली पुकार पर ही पहुंच गया था। उसे मिलाकर वहाँ करीब सौ लड़ाके अस्त्र-शस्त्र से लैस पहुंच चुके थे जो जगल में खूँख्वार भेड़ियों की तरह अपराधी की खोज में कुल्हाड़ियों और पाठलों से झाड़ियों को तहस नहस करते हुए चारों ओर फ़ैलते जा रहे थे। इन लड़ाकू पुरुषों के अलावा परमा की माँ सहित करीब पचास लड़ाकू स्त्रियां भी वहाँ तैनात थीं जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर किसी भी युद्ध, आक्रमण या अन्य हिंसक कार्यवाही के लिए तैयार रहना था।

परमा और कुछ अन्य नवयुवक घायल हिरन के बछड़े की देखभाल में लगे हुए थे और कबीले के आम लोग बार-बार पीछे मुड़ मुड़ कर देख रहे थे और सरदार के आने के बाद की होने वाली कार्यवाहियों का अंदाज़ा लगा रहे थे। उनके मन में उत्सुकता, आशंका और भय के मिले-जुले भाव तैर रहे थे। कोई नहीं जनता था कि हिरन के बछड़े को घायल करने की गलती किससे हुई होगी और इस जघन्य अपराध की उसे क्या सज़ा दी जाने वाली है। 

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शेष अगले अंक में क्रमश...
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Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
Opening Page:  Preface:  Introduction:  Episode-1:  Episode-2:  Episode-3:  Episode-4:  Episode-5:  Episode-6:  Episode-7:  Episode-8:  Episode-9: Episode-10: : Episode-11: Episode-12: Episode-13; Episode-14  
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Synonyms of Hindi words:
चिरपिरी मिर्ची= hot chilly; कटोरे= bowls; अलौकिक= devine; अंतर्मन= inner self; खड़ैरा= broom made of dried bushy plants; आत्मविश्वास ; उपजाऊ= fertile; सहयोग= cooperation ; सामाजिक= social; संवेदना= sensitivity; कानून= law; प्रतिबंध= restriction; वन्य जीवन= wild life; अस्तित्व= existence; निस्तब्ध= silent, tranquil; गगनचुंबी= sky high; प्रतिध्वनित= echoing; क्रूर= cruel; बैंत= cane; त्वरित= quick, abrupt; आक्रामक= aggressive; मिरगा= deer; ढपले= drum; जड़ी-बूटियां= herbs; अविचल= unmoved; जघन्य अपराध= serious crime; सरदार= chief; हिंसक सज़ाएं= cruel punishments; मानसिक संतुलन= mental balance; लड़ाकों= fighters
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Caution: This creative work has been originally written by the author Harish Jharia who is the sole owner of the text and this intellectual property. This has been published on the personal Blog “Discover Life” of Harish Jharia at the URL: http://harishjhariasblog.blogspot.com/. No hyperlink to this novel “Patthar ki Ibaarat” (Script of Stone) has been provided nor any permission granted to any person, organization or site whomsoever, by the writer and owner of the copyright of this novel that is Harish Jharia. This novel has been published on the blog “Discover Life” for the visitors to this blog for their healthy reading and intellectual entertainment. The novel in whole, in part or as extracts should not be copied and or reproduced neither on internet, nor written on CDs nor printed on books, magazines newspapers and or in any media.  - Harish Jharia
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