Harish Jharia

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15 May 2010

eNovel: Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone): Episode- 6


Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2010 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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© Harish Jharia

उपन्यास: पत्थर की इबारत, एपीसोड- 6

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ…

… मिरगा बीर के चेहरे पर सदा की भाँति शांत भाव छाया हुआ था। परंतु उसका शरीर बेचैनी और कबीले में घटी दुर्घट्ना के प्रति अपराधबोध के कारण निरंतर अस्थिर हो रहा था। उसकी भारी भरकम भुजाओं की मछलियों मे थिरकन हो रही थी, वह बाएँ हाथ से लगाम को दाहिने-बाएँ झटक कर घोड़े को लगातार अपने आस-पास की खाली ज़मीन पर घुमाता जा रहा था और उसके दाहिने हाथ में लंबी दुधारी तलवार लहरा रही थी। भीड़ के बीच दुबकी हुई नारियों के आतंकित चेहरों पर भय का भाव फ़ैला हुआ था और डबडबाई हुई आँखों से वे सात विशालकाय घुड़सवारों की भयावह शक्ति का ताण्डव अपनी आँखों के कोरों से ताक रही थीं। वहीं दूसरी ओर कबीले के पुरुषों के चेहरे मिरगा बीर की शक्ति का अंदाज़ा लगाकर गर्व से दमक रहे थे और उनका सीना शान से चौड़ा हो गया था…

और आगे…

परमा घायल मृग के पास खड़ा हुआ एकटक मिरगा बीर और उसके काले घोड़े का ध्यानपूर्वक अवलोकन कर रहा था। उसे रह-रह कर इस बात का सुखद एहसास हो रहा था कि उसके अलावा इतने नज़दीक से मिरगा बीर को आजतक कबीले के किसी निवासी ने नहीं देखा होगा और यह उसके लिए गर्व और सौभाग्य की बात थी कि वह उसके इतने निकट था कि अगर अपना हाथ बढ़ाता तो उसे छू भी सकता था।

परमा को यह देखकर अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ कि मिरगा बीर की भुजाएं स्वय परमा की जाँघों से भी अधिक भारी थीं। उनपर उभरी हुई मांस पेशियों से उसकी असीमित शक्ति का उसे अंदाज़ा लग रहा था। मिरगा बीर की भारी-भरकम, शक्तिमान और विराट आकृति की तुलना में उसके घोड़े का आकार भी बौना प्रतीत हो रहा था।

परमा आजतक यही समझता रहा था कि उसके पिता कोदू से अधिक विशालकाय, वीर, पराक्रमी और जाँबाज़ अन्य कोई नहीं था। लेकिन मिरगाबीर को प्रत्यक्ष इतने पास से देखने के बाद उसकी आस्था कुछ डगमगाने सी लगी थी। उसने अपनी आखों की कोरों से अपने पिता कोदू की ओर देखा जिसने आगे बढ़कर मिरगा बीर के घोड़े की नकेल पकड़ ली थी। अपने पिता को देखकर उसे सांत्वना मिली कि कोदू भी किसी से कम नही था जिसके हाथ लगाते ही मिरगा बीर का घोड़ा शांत होकर सीधा खड़ा हो गया था। घोड़े के शांत होते ही मिरगा बीर पलक झपकते ही बिजली की तेज़ी से उछलकर ज़मीन पर कूद गया। परमा को लगा जैसे कि मिरगा बीर के पैरों के आघात से धरती में कंपन हुआ हो जिसे उसने स्वय पाँच हाथ दूर खड़ हुए महसूस किया हो।

मिरगा बीर के गले में शेर के दो बड़े-बड़े नाखूनों को चाँदी के तारों में गूँथकर बनाया हुआ ‘बघनखा’ सूत की काली डोरी के सहारे लटक रहा था। बघनखा के दौनों ओर डोरी मे कौंड़ियाँ और कौंड़ियों के बीच चटक लाल पत्त्थर पिरोए गए थे। लोगों का कहना था कि बघनखा की माला पाटन नगर के कारीगरों के द्वारा बनाई गई थी और ऐसी मालाएं कठिन परीक्षाओं से गुज़रने के बाद कबीलों के सरदारों को उनकी नियुक्ति पर पाटन के राव सुमेर जू पहनाते थे। मिरगा बीर को बघनखा धारण किए हुए परमा बचपन से ही देखता आ रहा था। उसने ऊपरी धड़ पर कंधे से लेकर कमर तक मृग-चर्म की गहरे गले की बंडी धारण की हुई थी, जो कबीले के सरदार की दूसरी पहचान थी और तीसरी पहचान थी डेढ़ हाथ लंबी चमचमाती दुधारी तलवार जिसे उसने उस समय अपने दाहिने हाथ में मज़बूती से पकड़ रखा था। उसका धनुष और तरकश घोड़े के कधों पर कसे चमड़े के पट्टों के सहारे मज़बूती से बँधे हुए झूल रहे थे जिनके पीछे नंगी पीठ पर बैठकर मिरगा बीर घुड़सवारी किया करता था।

मिरगा बीर के शरीर का रंग धूप से ताँबिया हो गया था, आँखें बड़ी-बड़ी थीं और चेहरे पर बिरली डाढ़ी-मूँछ उगी हुई थीं। उसके काले घने बाल कंधे तक खुले झूल रहे थे जिन्हें वह रह-रह कर दाहिने-बाँए सर झटक कर चेहरे से हटाता रहता था। उसकी गरदन लंबी और उसके सर के आकार के बराबर भारी थी और कंधे अविश्वस्नीय सीमा तक मज़बूत थे। कमर के नीचे घुटने तक उसकी पोशाक वही सफ़ेद सूती परधनी की थी जिसपर चमड़े का चौड़ा पट्टा पीछे कुल्हाड़ी और आगे कटार तथा बगल में तलवार की म्यान के साथ कसा हुआ था। घुटने से लेकर पंजों तक उसने अन्य कबीले के लड़ाकों जैसे ही चमड़े की संकरी पट्टियाँ कस रखी थीं। उसके हाथों और पैरों के नाखून दो-अंगुल लंबे, नुकीले और मज़बूत थे। पैरों के नाखूनों से वह बीच-बीच में ज़मीन की घास को खरौंच देता था और उंगलियों के नाखूनों को अंगूठों के नाखूनों से साफ़ और पैना करता रहता था।

परमा को लग रहा था जैसे वह कोई सपना देख रहा हो। उसकी आँखें कम से कम समय में मिरगा बीर के व्यक्तित्व का अधिक से अधिक अवलोकन करने में व्यस्त थीं। तभी उसके मन में यह प्रश्न उभरा कि क्या वह भी कभी मिरगा बीर के जैसा बन पाएगा? … और तभी मिरगा बीर ने अपनी तलवार चमड़े की म्यान में आहिस्ता से डाली और अपनी गंभीर भारी आवाज़ में परमा से पूछा:

- काए रे मोड़ा… कैसो है जो बच्छा…?

परमा के तो जैसे भाग्य ही खुल गए… मिरगा बीर को स्वयं से बात करते हुए पाकर वह धन्य हो गया… उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था। पर उसने अपनी उत्तेजना को नियत्रित करते हुए मिरगा बीर को उत्तर दिया:

- अब तो टीक है… मिरगा बीर… परमा ने अपनी घबराहट को छुपाते हुए जवाब दिया।
- को है जौन नै मारो है ओहे…? मिरगा बीर ने दूसरा सवाल कर दिया तो परमा चुप रह गया।

ऐसे उत्तेजनापूर्ण वातावरण में जहाँ भय, क्रोध और आतंक से लोगों कि मन में अशांति और बेचैनी व्याप्त थी वहाँ मिरगा बीर के अलाव एक कोदू ही था जिसके मुख पर शांत भाव बरकरार था और हाव-भाव में आत्मविश्वास स्पष्ट रूप से नज़र आ रहा था। लड़ाकों का मुखिया होने के नाते कोदू आगे आया और बोला…
- मिरगा बीर…! तनक धीरज सें सुन्… तैं गुस्सा नैं हुइए… जा गलती भई है कढ़ोरी के मोड़ा भूरा के हाँथ सें…

मिरगा बीर की भवें तन गईं। उसने पलट सवाल किया:
- हाँ! तो कढ़ोरी के मोड़ा नें मारो है हिन्ना के बच्छा हे…? काए रे कोदू…! तोहे पता हतो…? तो फ़िर लड़ाकों हे काए नईं रोको तैंनें…? तनक देख तो का हाल कर डारो इनने जंगल की जरियों-झकरियों को… सब तरफ़ सत्यानास कर डारो।

- मिरगा बीर! कहूँ लड़ाकों हे पता चल जातो तो बे तोरे आबे सें पहलेई भूरा हे मार डारते।

कोदू ने मिरगा बीर की आँखों में झाँकते हुए आहिस्ता से बोला और दौनों ओर सर घुमा कर देखा कि कोई सुन तो नहीं पाया।

कोदू ने मिरगा बीर को बड़ी मुश्किल से अपनी बात सुनाने पर राज़ी किया और उसे विस्तार पूर्वक यथास्थिति से अवगत कराया… कि उनके कबीले का एक वयोवृद्ध लड़ाका कढ़ोरी था जिसका एकमात्र अठारह वर्षीय बेटा भूरा- सूरजमुखी पैदा हुआ था। उसके पूरे शरीर की त्वचा और बाल सब के सब सफ़ेद रंग के थे। उसके सर के बाल, आँखों की भवें और बरौनियॉ तक सफ़ेद थीं। सूर्य की रोशनी में उसका शरीर लाल चकत्तों से भर जाता था। उसकी आँखें भी सूरज की रोशनी को नहीं सह पातीं थीं। वह दिन के उजाले में न तो अपनी आँखें पूरी तरह खोल पाता था और नाही वह ठीक से देख ही पाता था।

उसकी आयु लगभग परमा के बराबर की हो चुकी थी। इसके बावजूद भी वह अपने हाथ से कुछ भी नहीं कर पाता था। कबीले की परंपरा के अनुसार भूरा को उस आयु तक परिवार और कबीले के सारे काम करने की कुशलता हासिल कर लेनी चाहिए थी। भोजन की व्यवस्था और कबीले की रक्षा करने के लिए शिकार करने और युद्ध-कला में भी पारंगत हो जाना आवश्यक था। कभी-कभी कबीले के लड़ाकों को युद्धों में पाटन राज्य की सैना का भी युद्ध मे साथ देना होता था। लेकिन अपनी जन्मजात शारीरिक कमज़ोरियों के कारण भूरा कुछ भी करने में सक्षम नहीं था। यही कारण था कि उसने मानसिक रूप से विचलित हो जाने के कारण झुंड से भटके मृगशावक पर छोटे धनुष और सरकंडे के तीर से वार कर दिया था क्योंकि भारी धनुष से पूर्ण विकसित शिकार पर ठोस बाँस के वज़नदार बाण चलाने के योग्य नाही उसमे शारीरिक शक्ति थी और ना कुशलता ही। यह जानकारी देने के बाद कोदू ने मिरगा बीर को समझाया:

- मोरी बात तनक ठंडे दिमाग सें सुन ले मिरगा बीर… और सोच-समझ ले… फ़िर कहूँ भूरा हे सजा सुनाबे को फ़ैसला करिए। कहूँ ऐसो ना हो जाय कै तोहे जनम भर पछताने पड़ै… एक गलत फ़ैसला के लाने…

- हूँ…! मिरगा बीर ने एक गंभीर हुंकार भरी और अपने घोड़े के कंधे पर कसे पट्टे से अपना भारी-भरकम धनुष खींच कर निकाल लिया। उसने धनुष के एक छोर को ज़मीन पर टिका कर बाँए पंजे से दबाया और दूसरे छोर को बाँए हाथ से पकड़ कर धनुष के कमान को झुका दिया और ताँत की प्रत्यंचा कमान के उस छोर पर चढा दी। उसने कोदू से पूछा:

- काए रे कोदू! बता कहाँ है भूरा…

कोदू ने सामने खड़े आँवले के ऊँचे वृक्ष के शीर्ष की ओर इशारा किया और कहा:
- बो ऊपर्… आँवरे के पत्तों मे लुको बैठो है…

मिरगा बीर ने सर उठाकर देखा कि आँवले के वृक्ष का पाँच पुरुष ऊंचा तना बिलकुल सपाट था जिसपर चढ़ना तो किसी तरह संभव था पर उतरना नामुमकिन था। लंबे चिकने तने के ऊपर घनी डालें निकली हुई थीं जिनके पत्तों में भूरा छुपा हुआ था। उसने तसल्ली के भाव में सर हिलाया और अपने धनुष को बाँए हाथ से ऊपर उठाकर उसकी प्रत्यंचा को दाहिने हाथ की चारों उंगलियों के छोरों में अटकाकर कान तक खींच लिया। वह कुछ देर उसी स्थिति मे रुका रहा फ़िर उसने ताँत की प्रत्यंचा को झटके से छोड़ दिया। ड़ोरी के छूटते ही कानों को चीरने वाली टंकार की साँय-साँय की आवाज़ निकली जिसने वहाँ मौजूद सभी लोगों को रोमांचित कर दिया। वृक्षों पर बैठे पक्षियों के झुंड के झुंड आतंकित हो आकाश में उड़ाने भरने लगे और आस-पास झाड़ियों में छुपे छोटे-छोटे जानवर जहां जगह मिली उसी ओर भागने लगे। ताँत की डोर में कुछ क्षणों तक टंकार की तीखी आवाज़ के साथ-साथ भयानक कंपन होता रहा जो धीरे-धीरे थमता गया और फ़िर चारों ओर पहले जैसी निस्तब्धता फ़ैल गई।

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शेष अगले अंक में क्रमशः
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Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
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Synonyms of Hindi words:
बछड़े= calf; उत्सुकता= curiosity; आशंका= suspicion; भय= fear; लड़ाके= fighters; कबीले= tribal clan; सन्नाटे= silence; आक्रामक= aggrassive; ताण्डव= lord Shiva’s dance of death; डबडबाई= tearful eyes; आतंकित= terrorized; दुधारी= double edged; कमानों= bows; तलवार= sword; विशालकाय = gigantic ; आँखों के कोरों = corners of eyes; गर्व= pride; काले घोड़े = black horse; अवलोकन = observation; सौभाग्य= good luck; भुजाएं= biceps; मांस पेशियों= muscles; विराट आकृति= huge built; बौना= dwarf; आस्था= belief; सांत्वना= consolation; आघात= strike; कंपन = vibrations; ‘बघनखा’ = a locket made out of a couple of tigers nails; चटक लाल पत्त्थर = vibrant red transparent stones; कारीगरों = artisans; मालाएं = necklaces; बंडी = jacket; अविश्वस्नीय = disbelief;म्यान = sheath; बच्छा = calf;धीरज = patience; जरियों-झकरियों= bushes; सत्यानास= devastation; छोरों= ends; झुंड= flocks; ताँत= chord, animal tendon; प्रत्यंचा= string of a bow; धनुष= bow; भारी-भरकम= gigantic; राज्य= kingdom; शीर्ष= top; कानों को चीरने वाली= jarring; ठोस बाँस= solid bamboo; पारंगत= skilled; बाण= Arrow; युद्धों= wars; नामुमकिन= impossible; जन्मजात= by birth; कुशलता= expertise;
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This creative work has been originally written by the author Harish Jharia who is the sole owner of the text and this intellectual property. This has been published on the personal Blog “Discover Life” of Harish Jharia at the URL: http://harishjhariasblog.blogspot.com/. No hyperlink to this novel “Patthar ki Ibaarat” (Script of Stone) has been provided nor any permission granted to any person, organization or site whomsoever, by the writer and owner of the copyright of this novel that is Harish Jharia. This novel has been published on the blog “Discover Life” for the visitors to this blog for their healthy reading and intellectual entertainment. The novel in whole, in part or as extracts should not be copied and or reproduced neither on internet, nor written on CDs nor printed on books, magazines newspapers and or in any media.
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