Harish Jharia

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27 October 2010

eNovel: Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone) : Episode- 8

Patthar kii Ibaarat (Smallest)

Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2010 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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उपन्यास: पत्थर की इबारत © एपीसोड- 8

© Harish Jharia

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ…

… चौथे तीर की बारी आने पर परमा को लगा कि मिरगा बीर उसी तीर को आखिरी सीढ़ी बनाने के लिए इस्तेमाल करेगा। पर सवाल यह था कि मिरगा बीर निशाना चूक कर परमा को हल्ला-गोंई के बतौर वार करने का मौका देता भी है या नहीं। तभी मिरगा बीर की कमान से तीर साँय-साँय की आवाज़ के साथ छूटा। परमा बाज की तरह पेड़ के तने पर आँखें गड़ाए हुए, धनुष की प्रत्यंचा को कान तक खींचे हुए और साँस रोक कर तीर छोड़ने के लिए तैयार था। उसी क्षण उसने देखा कि मिरगा बीर ने तीर निशाने से बाहर मार दिया। परमा तो इसी क्षण की ताक में था। उसने बिना एक क्षण का विलंब किए ठीक तीन हाथ नीचे चौथा तीर पेड़ के तने मे धँसा दिया।

भूरा लगभग ज़मीन के नज़दीक उतर आया था। उसने तने पर परमा के तीर का आघात अनुभव करते ही तीर को पंजों से टटोल कर ढूँढ लिया। वह अपने पैरों को तीर पर जमाकर खड़ा हुआ और जमीन पर कूद गया।  वह थर-थर काँप रहा था। उसने अपने दौनों हाथों से अपना चेहरा ढँक लिया और ज़मीन पर घुटनों में सर छुपाकर उकड़ूँ बैठ गया…

और आगे…

भूरा के ज़मीन पर उतरते ही निस्तब्ध वातावरण में लोगों के बीच खुसपुसाहट सी होने लगी। वहाँ उपस्थित लोगों ने यह कभी नहीं सोचा था कि मिरगा बीर मृग शावक को आहत करने के अपराधी को बिना कोई हानि पहुँचाए पेड़ से नीचे उतर जाने देगा। यही नहीं उन्हें इस बात का भी अचरज हो रहा था कि मिरगा बीर ने स्वयं अपने तीरों से भूरा के लिए सीढ़ियाँ तैयार कीं। सभी की नज़रें मिरगा बीर की ओर लगी हुई थीं और सब के सब यही अनुमान लगा रहे थे कि सरदार भूरा के साथ क्या सलूक करता है। मगर मिरगा बीर भूरा की ओर ध्यान देने की बजाय अपने पीछे पंक्तिबद्ध खड़े लड़ाकों की ओर उन्मुख होकर बोला-
“…कढ़ोरी कहाँ है…?”

सभी लड़ाके अपने आस-पास कढ़ोरी को खोजने लगे। तभी पहली पंक्ति में खड़ा कढ़ोरी  आगे आया और मिरगा बीर की ओर उसके आदेश की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए देखने लगा। मिरगा बीर पलक झपकते ही अपने घोड़े के पास पहुँच गया। उसने अपना धनुष और तरकश घोड़े की जीन पर वापस कसे और दुबारा अपने हथियारों पर बंधे पट्टों का परीक्षण किया। फ़िर अपने दाहिने पैर के नाखूनों से ज़मीन को खरौंचा और हाथों के नाखूनों को एक-दूसरे से कुरेदते हुए कढ़ोरी की ओर पलटा और बोला-
“…काए रे कढ़ोरी …! का सजा दऊँ तोरे मोड़ा हे?” (क्यों रे कढ़ोरी …! क्या सज़ा दूँ तेरे बेटे को…?) और और बिना कढ़ोरी की बात सुने मिरगा बीर आगे बोलता गया- “चल रे कढ़ोरी…! एक काम कर… आज तैंईं सजा दैदे अपने मोड़ा हे”। (एक काम कर्… आज तू ही दे दे सज़ा अपने बेटे को।

मिरगा बीर का आदेश सुनकर कढ़ोरी अवाक रह गया और वहाँ खड़ी तमाम भीड़ आश्चर्यचकित रह गई कि आखिर मिरगा बीर ऐसा क्यों कर रहा है। किंतु मिरगाबीर लोगों की प्रतिक्रिया को अनदेखा करते हुए, कढ़ोरी पर अपनी आँखें टिकाए हुए बोला-
“चल रे कढ़ोरी …! दे सजा अपने मोड़ा हे (बेटे को)…”

“मिरगा बीर, मैं का सजा दैहों ओहे, तोरे सामने… (मिरगाबीर! मैं क्या सज़ा दूँगा उसे, तेरी मौजूदगी में…। मुझमें तो हिम्मत नहीं है ऐसा करने की।) कढ़ोरी दौनों हाथ ऊपर उठाए हुए सर को दाँए-बाँए झुलाते हुए मिरगाबीर की आँखोँ मे आखें डाले हुए बोला। 

कढ़ोरी बोल ही रहा था कि तभी भूरा की माँ कल्लो भीड़ में से निकल कर बाहर आई और अपनी पूरी शक्ति लगाकर चिल्लाई-
“मिरगाबीर…! भूरा की कोई गलती नैंहाँ… (मिरगाबीर्…! भूरा की कोई गलती नहीं है… हिरन के बछड़े को चोट पहुँचाने के पीछे। आज सवेरे जब परमा हमारे घर शिकार पहुँचाकर वापस गया तो उसके पीठ फ़ेरेने के साथ ही भूरा का बाप उसके पीछे पीछे पड़ गया। कहने लगा कि उसी की उमर का परमा कैसे शिकार करके अपने घर और पड़ौसियों का पेट पालने के लायक हो गया है और भूरा कुछ भी नहीं कर पाता।)…

वह आगे कहती गई कि भूरा अपनी आँखों से लाचार था उजाले में आते ही उसकी आँखें चौंधियाने लगती थीं और शिकार करना उसके लिए नामुमकिन था। मगर भूरा के पास ऐसी विद्याएँ थीं  जो कबीले में और किसी के पास नही थीं। उसकी यह बात सुनकर मिरगाबीर असमंजस में पड़गया। वह झटके से उस दुबली-पतली नारी की ओर मुड़ा और बोला-
एरी कल्लो…! ऐसी कौन सी बिद्या आए तोरे मोड़ा के पास्…? (तेरे बेटे के पास ऐसी कौनसी विद्याएँ हैं?)

मिरगाबीर के प्रश्न के उत्तर में कल्लो ने अपने हाथ मे थामी हुई एक चमड़े की थैली मिरगाबीर की ओर बढ़ा दी… और कहा-
लै खुदइ देख ले… मिरगाबीर्… (वह आगे कहती गई कि बुदनी नदी की बारीक रेत से सोने के कण निथारकर उनसे लाख के मनकों और कड़ों पर सोने के पत्तर चढ़ाने में भूरा माहिर था। नदी की तलहटी में बिखरे लाल और हरे पत्थर बीनकर उन्हें नदी के तट पर पड़े पत्थरों पर तराश कर गहनों पर जड़ने की कला भी उसने खोज निकाली थी। कल्लो ने मिरगाबीर के हाथों पर चमड़े की बटुआ नुमा थैली रखदी और कहा कि वह स्वयं ही भूरा की कारीगरी थैली में सहेजकर रखे स्वर्णजड़ित आभूषणों पर प्रत्यक्ष देख सकता था।

कल्लो के द्वारा भूरा के अविश्वसनीय व्यक्तित्व का परिचय पाकर मिरगाबीर अवाक रह गया। उसने कल्लो के हाथ से थैली छीन ली, फिर एक घुटना जमीन पर टिका कर नीचे बैठा और थैली को जमीन की हरी घास पर उलट दिया। शुद्ध अछूते सोने से मढ़े मनके और कड़े हरीकच घास की पृष्ठभूमि और उनपर पड़ रही सूर्य की किरणों में दक-दक दमकने लगे। पेड़ों की पत्तियों से छन-छन कर आ रही सुबह की अलबेली धूप उन आभूषणों पर जड़ेहुए लाल-हरे पत्थरों से टकराकर आँखों को चौंधियाने लगी। साथ ही लगभग पचास-साठ लाल-हरे पत्थर आभूषणों के आस-पास बिखर कर अलग ही छटा बिखेरने लगे।

मिरगाबीर एक बार आभूषणों की ओर देखता और फिर अपने चारों ओर खुशियाँ मनाते कबीले के लोगों की ओर देखकर अपने दौनों हाथ हवा में ऊपर की ओर उठाकर और सर को दाँए-बाँए झुलाकर आश्चर्य प्रकट करता। कल्लो ने अपने दौनों हाथों की उंगलियाँ एक-दूसरे में जकड़कर गरदन के साथ सटा रकी थीं और खुशी से दाँए-बाँए डोलती जा रही थी। कढ़ोरी दौनों हाथ नीचे झुलाए हुए लाचार सा खड़ा हुआ चारों ओर घूम-घूम कर देख रहा था जैसे कि पश्चाताप के कारण भीतर ही भीतर प्रयश्चित कर रहा हो। ऐसा वातावरण कबीले के इतिहास में पहली बार निर्मित हुआ था जबकि सरदार और आम कबीलावासी सारी औपचारिकताएं और परपराएं भूलकर एकसाथ भावावेश में अपनी सुध-बुध खो बैठे थे।
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शब्दार्थ / Synonyms:
सीढ़ी= ladder; तीर= arrow; निशाना= aim; हल्ला-गोंई= combat buddy; कमान= bow; बाज= eagle, hawk; पेड़ के तने= tree trunk; प्रत्यंचा= bowstring; विलंब= delay; आघात= impulse, blow; पंजों= feet; निस्तब्ध= quiet, tranquil;  खुसपुसाहट= whisper;  सरदार= chieftain, commander; सलूक= treatment; पंक्तिबद्ध= queued, aligned; उन्मुख= turning to them, face to face; तरकश= quiver, magazine of arrows; खरौंचा= scratched; मोड़ा = boy, son; शिकार करके= hunting; आँखों से लाचार= partially visually handicapped; विद्याएँ= expertise; असमंजस= dilemma; सोने के कण= gold sand, gold dust,  लाख के मनकों= shellac beads; कड़ों= bangles; सोने के पत्तर= gold foils; माहिर= expert; तलहटी= bottom; तराश= cutting, grinding; जड़ने= embedding; बटुआ नुमा= wallet like; प्रत्यक्ष= obvious; अविश्वसनीय= unbelievable; व्यक्तित्व= character; अछूते= untouched, raw; पृष्ठभूमि= background; दमकने= glitter; चौंधियाने= dazzling; आश्चर्य= amazement; डोलती= swinging; भावावेश= passion; आश्चर्यचकित= surprised, amazed;  आभूषणों, गेहना = jewelry; पश्चाताप= repentance;  प्रयश्चित = atonement; इतिहास= history; औपचारिकताएं= formalities; परम्पराएं= traditions; भीड़= crowd; विशालकाय, भीमकाय=   gigantic; माँसपेशियों= muscles; थिरकन= vibrations;  सत्ता= power; पराक्रमी= mighty; आक्रामक= aggressive; अवाक= speechless; भयभीत= scared; मिचमिचाती= blinking; कलाकारी= art; गहन= deep; सजा= punishment; तमतमाकर= heating up; असमंजस= dilemma;  मृगशावक= baby deer; स्वर्णधूलि= gold dust; स्वर्णाभूषण= gold jewelry; कारीगरी= artistry; कायल= convinced, admirer; धर्मसंकट= reluctance; कलेवा= breakfast;  दरबार= court; जिम्मेदारी= responsibility; नरम व्यवहार= soft treatment; सुधबुध= senses; अनुमान= speculations
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Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
Opening Page:  Preface:  Introduction:  Episode-1:  Episode-2:  Episode-3:  Episode-4:  Episode-5:  Episode-6:  Episode-7:  Episode-8:  Episode-9: Episode-10: : Episode-11: Episode-12: Episode-13; Episode-14 
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A brief interpretation of the story so far…

The fighter tribes of an unnamed hemlet, situated in the east central dense forests, used iron tools like axes, daggers and swords for fighting enemies and hunting for their livelihood. They used bows and arrows as their weapons for shooting distant targets. Bows and arrows were made of solid, strong and flexible bamboos. The arrowheads were made of iron for easy penetration through flash and bones of wild animals. They also procured cane from distant forests for making arrows for stronger impact, deep penetration and longer range for hunting huge wild animals. 

In spite of the fact that their prime job was hunting wild animals, rodents, fish and birds for their survival, they also followed a social regime of wildlife conservation. The chief of their hamlet Mirga Bir used to award severe punishments to the people who happened to kill animals mischievously or hunting around just for fun. They also had a system of hunting one animal at a time for four to five families. There was a strict ban on killing calves and female animals. 

One morning Parma, a strong huge youth hunted an animal, divided the prey into five shares, inclusive of one for his own family. He then went out for distributing one each to four other families in his neighborhood. On his way back to home he heard a screeching cry of a baby deer. Parma was shocked on hearing the painful cry of an infant animal so late in the morning when the sun had raised quite high in the sky. He rushed in the direction of the incident and found that another youth named Bhoora, who had many inherent health disabilities, had injured a baby deer with an arrow shot from his fathers bow. 

Because of his disabilities Bhoora could not learn professional hunting. He was not even capable of tying the string of a bow and shooting an arrow from it. He was not able to keep his eyes open because of hypersensitivity to light. He was not even able to roam around with his eyes wide open after sunrise. Because of all these disabilities he used to feel ignored by the people of the hamlet because of his frail structure and weak body. Eventually out of frustration he took an extreme step by stealing a small bow of his father Kadhori and ventured out for a hunt like other youths of the hamlet. 

Bhoora did not find any grownup animal for hunting as the animals had already left for a safer place, away from human population after dawn. He incidentally found a small baby deer, distracted from her herd, in the dense bushes and shot an arrow at it. The unskillfully shot arrow hit the animal at its rear torso and penetrated superficially, rendering the baby animal withering with pain and temporarily disabling its hind leg. 

Parma raised crisis alarm by shouting at the top of his voice and tried to give first-aid to the baby deer. He collected leaves of medicinal herbs found in the adjoining surroundings, smeared them and applied them on the bleeding wound. The people of Bargi responded to the distress call and a crowd of about hundred people assembled at the place of incident. The chief (Sardar) of the hamlet Mirga Bir also arrived at the spot with his six bodyguards riding on huge horses. By that time Bhoora climbed on a gooseberry (Amla) tree and hid him behind thick bunches of leaves. 

Mirga Bir  shot multiple arrows at the trunk of the Amla tree forming a ladder for Bhoora to climb down over the smooth trunk of gooseberry tree. Parma acted as the ‘combat buddy’ to Mirga Bir while he was shooting arrows, one after the other at the tree trunk.  Mirga Bir expressed his surprise and satisfaction when he deliberately missed a shot at the trunk and the ever alert Parma shot an arrow at the predefined target and concluded the ladder formed by Mirga Bir. 

Mirga Bir asked Bhoora’s father Kadhori to punish his son rather than awarding a punishment himself. At that moment Bhoora’s mother Kallo came forward and  took Mirga Bir and the crowd by a pleasant surprise by disclosing that her son had developed a rare talent of collecting gold dust from the riverbed sand and making gold coated beads and bangles with shellac (Lakh).  He also learnt grinding and shaping the green and red transparent stones and mounting them on the shellac ornaments. Mirga Bir and the crowd could not believe the sight of the dazzling gold-work when Kallo displayed gold-coated and jewel studded shellac ornaments in front of Mirga Bir.

Discovery of gold-coated and jewel-studded shellac ornament was a historic breakthrough for the hamlet at the times when the people of primitive tribes were using bones and teeth of animals for making their ornaments.  With the sight of glittering gold and stone-studded jewelry Mirga Bir and the crowd forgot the purpose of their assembly for a moment.

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