Harish Jharia

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24 September 2011

eNovel: Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone) : Episode- 9

Patthar ki Ibaarat cropped
Ashburn, Virginia, USA

Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2011 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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उपन्यास: पत्थर की इबारत © एपीसोड- 9

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ… 

… मिरगा बीर एक बार आभूषणों की ओर देखता और फिर अपने चारों ओर खुशियाँ मनाते कबीले के लोगों की ओर देखकर अपने दौनों हाथ हवा में ऊपर की ओर उठाकर और सर को दाँए-बाँए झुलाकर आश्चर्य प्रकट करता। कल्लो ने अपने दौनों हाथों की उंगलियाँ एक-दूसरे में जकड़कर गरदन के साथ सटा रकी थीं और खुशी से दाँए-बाँए डोलती जा रही थी। कढ़ोरी दौनों हाथ नीचे झुलाए हुए लाचार सा खड़ा हुआ चारों ओर घूम-घूम कर देख रहा था जैसे कि पश्चाताप के कारण भीतर ही भीतर प्रयश्चित कर रहा हो। ऐसा वातावरण कबीले के इतिहास में पहली बार निर्मित हुआ था जबकि सरदार और आम कबीलावासी सारी औपचारिकताएं और परम्पराएं  भूलकर एकसाथ भावावेश में अपनी सुध-बुध खो बैठे थे… 

और आगे…

हर्षोल्ल्हास के वातावरण में मिरगा बीर ह्ल्के कदमों से भूरा की ओर बढ़ा तो वहाँ उपस्थित भीड़ का शोर भी धीरे-धीरे थमने लगा। सभी की नज़रें विशालकाय मिरगा बीर पर जा टिकीं। उसके हर कदम पर धरती में कंपन हो रहा था और घुटनों के ऊपर की माँसपेशियों में थिरकन हो रही थी। वह अपनी हृष्ट-पुष्ट भुजाओं को झुलाता हुआ भूरा की ओर बढ़ रहा था। उसका चेहरा सत्ता के आत्मविश्वास से दमक रहा था। वहाँ उपस्थित कबीले के लोग परम पराक्रमी और आक्रामक स्वभाव के मिरगाबीर के होठों पर उभरी हल्की मुस्कान और आँखों में स्नेह देख्कर अचंभित और अवाक रह गए थे। 

मिरगा बीर के कदमों की आहट सुनकर भूरा ने घुटनों के बीच से अपने चेहरे को ऊपर उठाया। उसने चौंक कर चारों तरफ़ देखा और एक ही क्षण में उसकी दृष्टि सीधे मिरगा बीर पर जाकर ठहर गई। कबीले के भीमकाय सरदार को अपनी ओर आता हुआ देख कर भूरा सिहर उठा और झटके के साथ उठकर खड़ा हो गया। उसने भयभीत होकर अपना चेहरा एक ओर घुमाया और मिचमिचाती तिरछी आँखों से मिरगा बीर की ओर देखने लगा। उसने अपने दौनों घुटने भय के मारे आपस में जोड़ रखे थे और दौनों हाथों की उंगलियों को एक-दूसरे के साथ फ़ँसा कर कर गर्दन के नीचे सटा रखा था। 

मिरगाबीर जाकर भूरा के सामने रुक गया और दाहिने पैर के नाखूनों से ज़मीन को खरौंच कर तिरछी गरदन करके भूरा की आँखों में देखने लगा और दौनों हाथों के नाखूनों को एक दूसरे से कुरेदते हुए भूरा से बोला- 
“देख रे भूरा…!” उसने अपनी गहन और भारी आवाज़ मे कहा- “तैं जे धोखे में ना रहिए कि तेरी कलाकारी की बदौलत तैं छूट जाहे… तोहे सजा तो बराबर मिलहै”

भूरा का दूध जैसा सफ़ेद चेहरा भय से तमतमाकर लाल हो गया। उसके सफ़ेद बाल चेहरे के दौनों ओर झूल गए और हवा के झौंकों के साथ चेहरे पर बिखरने लगे। वह अचकचाकर एक कदम पीछे हटा तभी उसकी माँ कल्लो दौड़कर भूरा के पास आ पहुंची और उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई। अपने पीछे माँ की उपस्तिथि को अनुभव कर भूरा को कुछ हिम्मत सी बंधी और उसने पास ही खड़े अपने पिता कढ़ोरी पर एक नज़र डाली। मिरगा बीर ने भी कढ़ोरी की ओर गरदन घुमाई और बोला-
“काए रे कढ़ोरी, मैंने तो भूरा हे सजा दैबे के लाने तोहे कही थी… और तैंने उल्टे हमारे ऊपर  जे जिम्मेदारी डाल दई”

कढ़ोरी ने कभी नहीं सोचा था कि मिरगा बीर दुबारा उससे इस बात का ज़िक्र करेगा। वह उसकी बात सुनने के बाद भी असमंजस में कुछ नहीं बोल पा रहा था और डर के मारे कभी मिरगा बीर की ओर देखता और कभी कबीले वालों की तरफ़ ताकता।  

वहाँ उपस्थित कबीले वालों को भी सरदार का यह नरम व्यवहार अस्वाभाविक लग रहा था। वे भली भाँति जानते थे कि एक ओर तो भूरा के हाथों मृगशावक को घायल किए जाने के अपराध से सरदार नाराज़ था और दूसरी ओर उसके द्वारा नदी की रेत से स्वर्णधूलि निथारने की कला और स्वर्णाभूषण निर्माण की कारीगरी के बारे में जानकर मिरगा बीर उसका कायल होगया था। लोगों को मिरगा बीर का धर्मसंकट स्पष्ट नज़र आ रहा था। सुबह का पहला पहर बीतता जा रहा था पर घरों मे अभी तक कलेवा बनाने की शुरुआत भी नहीं हुई थी। मगर जंगल के बीचोंबीच स्थित कबीले के सरदार मिरगा बीर के दरबार में जुड़ी हुई सभा में कबीले के लोग अपनी सुधबुध खो कर सरदार के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे थे।        

कबीले के लोग सरदार के असमंजस की स्थिति का अनुमान लगा ही रहे थे कि एकाएक मिरगा बीर ने अपने दौनों हाथ ऊपर उठाकर सभा को शांत होने का संकेत दे दिया। एक क्षण में ही वहाँ का वातवरण बदल गया और चारों ओर सन्नाटा फ़ैल गया। मिरगा बीर के चेहरे पर एकाएक आई गंभीरता ने क्षण भर में ही कबीले वालों और सरदार के बीच की खाई को फ़िर पहले जैसा चौड़ा कर दिया और मिरगा बीर उन्हें किसी दूसरी दुनियाँ से आया हुआ फ़रिश्ता नज़र आने लगा। 

मिरगा बीर के बदले हुए मिजाज़ के साथ ही उसके घुड़सवार अंगरक्षक भी एकाएक चौकन्ने होगए। उन्होंने ने अपने-अपने घोड़ों को एड़ लगा कर लगाम खींच दीं। उनके घोड़े पिछले पैरों पर खड़े होकर हिनहिनाने लगे। कबीले के लड़ाकों ने पुनः आगे की पंक्ति को दुरुस्त कर लिया और उनके ठीक पीछे कबीले के लोगों ने एकाएक विचलित होकर एक-दूसरे के हाथ कसकर थामलिये। 

उन्हें यह अनुमान हो गया कि अगले ही क्षण मिरगा बीर अपना अंतिम निर्णय सुनाने वाला है और ऐसा ही हुआ। सरदार की गहन और भारी भरकम आवाज़ जंगल के ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से टकराकर लोगों के कानों में गूंजने लगी। 

वह बोला-
“भूरा की कलाकारी के बारे में जानकैं हमें भारी अच्छो लगो… हमैं ऐसो लगो जैसे अपने कबीला मैं राव सुमेर जू के राज को कारीगर आ बसो है… हम जे भी चाहत हैं कि भूरा के लाने गेहना बनाबे के औजार और भट्टी पाटन से लाकै कबीला में लगाई जाएँ… और भूरा हे पाटन राज में कारीगरी सीखबे भेजो जाए…” 

फ़िर कुछ रुक कर उसने चारों ओर घूमकर लोगोंको उंगली दिखाकर चेतावनी दी- 
“…मनौ (मगर), कबीला वाले और भूरा के घर के लोग जे नहीं समझें कि हिरन के बच्छा हे घायल करबे की सजा से भूरा बच जाहै… सजा तो ओहै मिलहे ही… ”

यह कहकर मिरगा बीर परमा की ओर घूमा और बोला-
“सुन रे परमा…! आज से रोज सबेरे भुकभुके में (सूर्योदय के समय) भूरा हे संग में पहाड़ पै लैजाए करे और ओहे तबतक दौड़ाए करे जबतक बो (वह) थक-हार कैं धरती पै ना गिर पड़ै…”

फ़िर वह भूरा की तरफ़ पलटा और चीख कर बोला-
“भूरा… आ… आ… आ…! तैं आज सैं परमा को बंदी भओ… हिरन के बच्छा हे गोदी में उठा और अपने घर लैजा… ओकी सेवा और दबा-दारू कर जब तक कैं बो (वह) कूदन-फ़ाँदन ना लगै… और सुन्…! कल सबेरे सें परमा के सगैं रोज पहाड़ पै जाए करे और पहाड़ पै नीचे से ऊपर ओर ऊपर से नीचे दौड़ लगाए करे… मोहे लैंड़ू (कमजोर) जवान  कबीला में नहीं चहिए… सेर घाँईं (शेर जैसा) बहादुर और जाँबाज लड़ाका बनकैं दिखा… तब तक तोरी जेई सजा है…”

इतना कहकर मिरगा बीर कूद्कर एक ही उछाल में अपने घोड़े पर सवार हो गया। उसने घोड़े की लगाम एक तरफ़ को खींची और एड़ लगा दी। घोड़ा हिनहिनाकर उछला और पीछे की ओर घूमकर कुलाँचें भरता हुआ दौड़ पड़ा। उसके अंगरक्षक भी बिजली की तेज़ी से पलटे और आँधी की गति से मिरगा बीर के पीछे हो लिए।

एक ही  पल में मिरगा बीर और उसका तूफानी दल आँखों से ओझल हो गया और कबीले वाले मुंह खोले खड़े पीछे रह गए और  सबकी नज़रें मिरगा बीर के घुड़सवारों द्वारा पीछे छोड़े गए धूल के गुबार पर टिकी रही।
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शब्दार्थ / Synonyms:
आभूषणों, गेहना = jewelry; पश्चाताप= repentance;  प्रयश्चित = atonement; इतिहास= history; औपचारिकताएं= formalities; परम्पराएं= traditions; भीड़= crowd; विशालकाय, भीमकाय=   gigantic; माँसपेशियों= muscles; थिरकन= vibrations;  सत्ता= power; पराक्रमी= mighty; आक्रामक= aggressive; अवाक= speechless; भयभीत= scared; मिचमिचाती= blinking; कलाकारी= art; गहन= deep; सजा= punishment; तमतमाकर= heating up; असमंजस= dilemma;  मृगशावक= baby deer; स्वर्णधूलि= gold dust; स्वर्णाभूषण= gold jewelry; कारीगरी= artistry; कायल= convinced, admirer; धर्मसंकट= reluctance; कलेवा= breakfast;  दरबार= court; जिम्मेदारी= responsibility; नरम व्यवहार= soft treatment; सुधबुध= senses; अनुमान= speculations; सभा= assembly, house; क्षण = moment;  गंभीरता= seriousness; खाई= ditch, rift, difference; फ़रिश्ता= angel, alien; मिजाज़= mood; घुड़सवार= horse rider, knight; लड़ाकों= soldiers, fighters; पंक्ति= row;विचलित= shaken, jolted; निर्णय= decision, ruling; गूंजने= echoing, reverberating; औजार= tools; भट्टी= furnace, burner; बच्छा= calf, baby animal; सजा= punishment; भुकभुके= dawn; पहाड़= hills; बंदी= captive, detainee; दबा-दारू= treatment; लैंड़ू= spineless, frail; सेर= tiger; उछाल= bounce, hop; लगाम= bridle, rein; एड़= tickling horse with heels; हिनहिनाकर= whinnying of horse; कुलाँचें= hops;    अंगरक्षक= bodyguard; गुबार= gust of dirt.
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शेष अगले अंक में क्रमश...
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Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
Opening Page:  Preface:  Introduction:  Episode-1:  Episode-2:  Episode-3:  Episode-4:  Episode-5:  Episode-6:  Episode-7:  Episode-8:  Episode-9: Episode-10: : Episode-11: Episode-12: Episode-13; Episode-14   
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Caution:
This creative work has been originally written by the author Harish Jharia who is the sole owner of the text and this intellectual property. This has been published on the personal Blog “Discover Life” of Harish Jharia at the URL: http://harishjhariasblog.blogspot.com/. No hyperlink to this novel “Patthar ki Ibaarat” (Script of Stone) has been provided nor any permission granted to any person, organization or site whomsoever, by the writer and owner of the copyright of this novel that is Harish Jharia. This novel has been published on the blog “Discover Life” for the visitors to this blog for their healthy reading and intellectual entertainment. The novel in whole, in part or as extracts should not be copied and or reproduced neither on internet, nor written on CDs nor printed on books, magazines newspapers and or in any media.
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This is a work of fiction and all the characters, story, incidents, culture, social life, evolution, developments etc are all imaginary. This article / Story / fiction is written based on my personal observations and imagination. My intention for publishing the same is to provide healthy reading and intellectual entertainment and not for educating the visitors. Names of people, societies, communities and description of faiths, beliefs, incidents are imaginary and fictitious. They have neither any relevance to the prevailing entities and traditions nor have any similarities with ongoing lifestyles, political ideologies and legal doctrines. The contents of this creative work have not been written with any intention to criticize, condemn or oppose anything what-so-ever present in reality in any country in the world. No literature or authentic books have been referred for writing the contents of this article. The visitors are advised not to refer the contents of this article for any research or testimony on scientific, geographical, political, civic, social or legal purposes. The visitors are further advised to consult relevant experts before adapting any information from this article. The author or the website are not responsible for any errors, mistakes, or omissions there in.
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