Harish Jharia

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24 October 2011

eNovel: Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone) : Episode- 10

Ashburn, Virginia, USA


Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2011 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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उपन्यास: पत्थर की इबारत © एपीसोड- 10

© हरीश झारिया

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ… 

इतना कहकर मिरगा बीर कूद्कर एक ही उछाल में अपने घोड़े पर सवार हो गया। उसने घोड़े की लगाम एक तरफ़ को खींची और एड़ लगा दी। घोड़ा हिनहिनाकर उछला और पीछे की ओर घूमकर कुलाँचें भरता हुआ दौड़ पड़ा। उसके अंगरक्षक भी बिजली की तेज़ी से पलटे और आँधी की गति से दौड़पड़े। एक पल में ही मिरगा बीर आँखों से ओझल हो गया और पीछे कबीले वाले मुंह बाए खड़े रह गए। सबकी नज़रें मिरगा बीर के घुड़सवारों द्वारा पीछे छोड़े गए धूल के गुबार पर टिकी रही…

और आगे…

कबीले वाले मिरगा बीर और उसके अंगरक्षकों के घोड़ों द्वारा पीछे छोड़े गए धूल के गुबारों पर तब तक नज़र टिकाए रहे जबतक कि घोड़ों के टापों की आवाज़ आती रही। मिरगा बीर के कबीले में सामाजिक अनुशासन और सरदार के प्रति इतना अधिक सम्मान व्याप्त था कि सरदार के जाने के बाद भी कई क्षणों तक सभा में सन्नाटा छाया रहा। 

सभा विसर्जन के बाद सबसे पहले परमा की माँ नौनी, जो महिला लड़ाका-प्रमुख भी थी, भीड़ से बाहर आई और उसने कबीले की महिलाओं को सभा से विसर्जित होने का संकेत दिया। उसका संकेत पाते ही सभी महिलाएं तेज़ी से अपने-अपने घरों की ओर रवाना होने लगीं। सभी को शीघ्र ही भोजन तैयार करने की चिंता लगी हुई थी। सूरज काफ़ी ऊपर तक चढ़ आया था और माँओं को अपने बच्चों की चिन्ता सताने लगी थी। दस वर्ष तक की आयु के सभी बच्चे अपने-अपने घरों में भूखे बैठे हुए थे। 

बच्चों की भूख के अतिरिक्त गृहणियों को गाय-बकरियों की भी चिंता सताने लगी थी जिन्हें दूसरे पहर तक पानी और चारा नहीं मिल पाया था। प्रतिदिन की तरह उस दिन प्रातःकाल, किशोरियाँ अपने-अपने परिवार के घरैलू पशुओं को पानी पिलाने नदी पर नहीं ले जा पाई थीं, नाही उन्हें चारा खिला पाई थीं। सभी घरों से बकरियों के मिमियाने और गायों के रम्भाने की आवाज़ें आने लगी थीं यही कारण था कि कुछ ही क्षणों में कबीले की महिलाएं और किशोरियां शीग्रता पूर्वक अपने-अपने घरों की ओर लगभग दौड़ती-भागती हुई रवाना हो गईं थीं।

कबीले के वयस्क पुरुष, युवक और किशोर धैर्यतापूर्वक घटनास्थल से महिलाओं की रवानगी की प्रतीक्षा कर रहे थे क्योंकि वे अपना प्रातःकालीन कार्य सम्पन्न कर चुके थे। युवक सुबह का आखेट कर चुके थे और अपनी-अपनी शिकार लाकर और काट-साफ़ कर कबीले के परिवारों तक पहुंचा चुके थे। उन्हें परमा के पिता और कबीले के लड़ाका-प्रमुख कोदू के आदेशों की प्रतीक्षा थी। सभी यह जानने के लिए उत्सुक थे कि मिरगा बीर ने कोदू के द्वारा क्या-क्या आदेश जारी किये थे। 

मिरगा बीर के बाद कोदू ही कबीले का सर्वेसर्वा था और सरदार के सभी आदेश कोदू से होते हुए ही आम लोगों तक पहुंचते थे। सरदार के आदेशों को लागू करने और कबीले में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी कोदू की ही थी। यहां तक कि मिरगा बीर के अंगरक्षक भी कोदू के अधिकारक्षेत्र में ही आते थे। कबीले में, मिरगा बीर के बाद कोदू की ही हुकूमत चलती थी क्योंकि उसके पास बेहिसाब विशेषाधिकार हुआ करते थे। वह विशालकाय मज़बूत कद-काठी का महावीर योद्धा था। मिरगा बीर के बाद कोदू ही एक धनुर्धर और तलवारबाज़ था जिसका दूर दूर तक कोई सानी नहीं था। यही कारण था कि कबीले के लोग उसे पूरा सम्मान देते थे और ‘कोदू बीर’ कहकर पुकारा करते थे। 

महिलाओं के जाने के बाद कोदू भीड़ से अलग निकलकर घेरे के बीचोंबीच खड़ा हो गया और उससे आठ-दस हाथ दूर, चारों ओर, घेरा बनाए हुए आगे की पंक्ति में लड़ाके चाक-चौबंद तैनात हो गए। उनके पीछे से बाकी कबीला वासी झांक-झांक कर कोदू की ओर ताकने लगे और उसके अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगे। पुरुषवर्ग के लिए सभा समाप्ति की घोषणा तब तक नहीं हुई थी जोकि कोदू को ही करनी थी। कोदू का विशालकाय हृटपुष्ट शरीर कबीले के करीब दो सौ पुरुषों के बीच बिलकुल अलग नज़र आ रहा था। उसकी कमर पर कसे चमड़े के पट्टे से दुधारी तलवार लटक रही थी, जो उसके शरीर में हो रही हरकत के साथ-साथ डोलती जा रही थी। पेड़ों की पत्तियों से छन-छन कर आती हुई सूरज की किरणें उसकी तलवार से टकराकर लोगों की आँखो को चौंधिया रही थीं। उसने बाँए हाथ में अपना भारी-भरकम धनुष मज़बूती से पकड़ रखा था और पीठ पर करीब 25-30 तीरों से भरा हुआ तरकश बाँध रखा था। 

पहले उसने चारों ओर घूम कर एक बार पूरी सभा का मुआयना किया; फ़िर घास पर पड़े बहुमूल्य रंगीन पत्थरों और स्वर्णजड़ित लाख की चूड़ियों की ओर देख कर ठिठक गया। उसने अग्रिम पंक्ति में खड़े हुए कढ़ोरी की ओर देखा और दाहिने हाथ को उठा कर तर्जनी से कुछ संकेत किया। प्रस्तर प्रतिमा की तरह स्थिर खड़े हुए कढ़ोरी के शरीर में एकाएक बादलों में कौंधती बिजली जैसी हरकत हुई और वह एक क्षण भर में स्वरणाभूषणों के पास पहुंच कर एक घुटना ज़मीन पर टिका कर बैठ गया। उसने वहाँ पड़ी स्वर्णजड़ित चूड़ियों और बहुमूल्य रत्नों को सावधानी पूर्वक उठाकर वहीं पड़ी हुई चमड़े की थैली में रख लिया और थैली को अपने कमर पट्टे में खौंस लिया। फ़िर वह उसी तेज़ी से वापस अपने स्थान पर जाकर खड़ा हो गया। 

कोदू, ध्यान पूर्वक कढ़ोरी के कार्यकलापों को देखता जा रहा था और कार्य समाप्ति पर उसने हल्के से मुस्कुराकर अपनी संतुष्टि प्रकट की। कढ़ोरी ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की और एक अनुशासित सैनिक की भाँति वह पुनः अपने स्थान पर जाकर पत्थर की प्रतिमा की तरह स्थिर खड़ा हो गया। अगले ही क्षण कोदू ने मिरगा बीर का आदेश कबीले के लोगों को सुनाया और सभा विसर्जन की घोषणा कर दी। उसने कहा-
“सब कोई कान लगा कें सुनो… मिरगा बीर नें आज की पंचायत में सबसे जरूरी बात जे कही है की भूरा की सजा दो हिस्सों में चलहै (चलेगी)… एक तो भूरा हिन्ना के बच्छा की दबा-दारू और देख-भाल करहै और दूसरी बात जे है की भूरा रोज भुंसारैं (सुबह) पहाड़ की तराई में जाए करहै और नीचें सें ऊपर और ऊपर सें नीचें, दूसरे पहर तक दौड़ लगाए करहै। जे सजा के संगैं- संगैं भूरा तीर चलाबो भी सीखहै… जबतक की बो सिकार करबो ना सीख जाए। भूरा जौन दिना सिकार करके लैआहै बई दिना ओकी सजा पूरी होहै। मिरगा बीर नें जा भी बात भी कही है कि भूरा हे तीर चलाबो परमा सिखाहै। जितने दिन तक भूरा की दोई सजा चलहैं तब तक दिनऊगे सें दिनडूबे तक परमा भूरा के संगैं-संगैं लगौ रहहै।“ 

इतना कहकर कोदू एक पल के लिए रुका और फ़िए कुछ ऊंची आवाज़ मे बोला- 
“सबै कबीला बारे अब घरै चले जाएं… मनौ (परंतु), भूरा और परमा इतैं रुक जाएं।“

इतना कह कर कोदू ने एक गहरी साँस ली और घूम कर घायल हिरन की ओर मुड़ा। हिरन का घायल बच्चा ज़मीन पर बैठा हुआ ज़ोर-ज़ोर से साँसें ले रहा था। कोदू उसके नज़दीक पहुंचा और घुट्ने के बल बैठकर उसे हाथ से सहलाने लगा। सर पर हाथ फ़ेरते ही बछड़े के गले से हल्की सी कराह की आवाज़ निकली और उसने कोदू की ओर सर घुमाकर कातर आँखों से देखा। कोदू ने उसे प्यार से पुचकारा, धनुष ज़मीन पर रखा और अपने हाथों का सहारा देकर खड़ा करने का प्रयास किया। मृगशावक लडखड़ाकर अपने तीन पैरों पर खड़ा हो गया। उसने घायल पुट्ठे वाले पैर को ऊपर उठा रखा था जिसमें हल्का-हल्का कंपन हो रहा था। कोदू ने सर घुमाकर परमा की ओर देखा और बोला-
“परमा…! घाव गहरो है रे… मोहे तो लगत है कि डम्हा लगाने पड़है…”

बोल कर कोदू फ़िर बछड़े की ओर संवेदनापूर्ण भाव से देखने लगा। ‘डम्हा’ की बात सुनकर परमा और भूरा कोदू की ओर एकटक देखने लगे। कोदू बछड़े के सर को अपने दौनों हाथो में लेकर उसकी आँखों में आँखें डालकर जैसे बातें करने लगा। परमा अपने पिता के बगल में घुटना टेक कर बैठ गया और हिरन के घाव का आशंकापूर्वक निरीक्षण करने लगा। भूरा के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं और भय से उसकी आँखें फ़टी की फ़टी रह गईं। उसके मन में चल रही अपराध भावना और भी प्रचंड हो गई और उसका मन आत्मग्लानि से भर गया। 

वहाँ के वातावरण में संवेदना, भय, आशंका और आत्मग्लानि की भावनाओं का सहसा उदय ‘डम्हा’ के ज़िक्र के साथ ही हुआ था। ‘डम्हा’ एक अत्यंत ही तकलीफ़देह चिकित्सा की प्रक्रिया हुआ करती थी जो ताज़े घावों पर की जाती थी। जानकारों का ऐसा विश्वास था कि सही इलाज के अभाव में गहरे घावों के सड़ने की पूरी आशंका रहती है जिसके परिणाम स्वरूप रोगी की जान भी जा सकती है। ऐसी जानलेवा स्तिथि से बचने के लिए घाव पर डम्हा लगाया जाता था। डम्हा लगाने के बाद घाव शीघ्रता से भर जाया करता था और रोगी की मृत्यु की आशंकाएं समाप्त हो जाती थीं।

डम्हा लगाने के लिए पहले पानी से घाव पर लगी हुई मिट्टी और गंदगी को साफ़ किया जाता था और घाव पर बचे हुए पानी को पौंछा और सुखाया जाता था। डम्हा लगाने के लिए लोहे की हंसिया को आग पर लाल होने तक गरम किया जाता था। फ़िर लाल गर्म हँसिया की नोँक से खुले घाव की सतह को सावधानी पूर्वक जलाया जाता था। सही प्रक्रिया का पालन करने के लिए दो हँसिया एक साथ गरम किये जाते थे ताकि जबतक एक हँसिया से ड्म्हा लगाया जाए, तबतक दूसरा हसिया गरम हो जाए।  

डम्हा की प्रक्रिया अत्यधिक कष्टदायक होने के बावजूद, मनुष्य और पशु की मृत्यु से रक्षा करने के लिए इसे आवश्यक माना जाता था। इसकी कष्ट्दायक प्रक्रिया की कल्पना मात्र से ही कोदू जैसे आक्रामक योद्धा के मन में भी हिरन के प्रति संवेदना की भावना उत्पन्न हुई। परमा, जो लगभग हर तीसरे-चौथे दिन एक हिरन का शिकार किया करता था, वह भी डम्हा के नाम से एकाएक विचलित हो गया। भूरा का हाल तो और भी बुरा था, जो जीवित प्राणी के घाव पर लाल धधकते लोहे के स्पर्ष की कल्पना मात्र से ही भयाक्रंत हो गया था।  

कोदू यह बात भली भाँति जानता था कि घायल मृग के घाव पर अविलंब ही डम्हा लगाना ज़रूरी था। वह एकाएक उठ खड़ा हुआ और दौनों नवजवानों को चलने का संकेत देते हुए अपने घर की ओर लंबे-लंबे कदम रखता हुआ चल पड़ा। भूरा का बगुले के पंख जैसा सफ़ेद चेहरा सुबह की हल्की धूप से ही लाल सुर्ख हो गया था। आँखों पर प्रकाश पड़ने से उसे पलकें खोलने में परेशानी हो रही थी।  उसके शरीर की सफ़ेद त्वचा पर जगह-जगह खरोंच के निशान पड़े हुए थे। ह्ल्का पीलापन लिए हुए उसके सफ़ेद बाल पूरे चेहरे पर बिखरे हुए थे। उसने पीड़ित मृगशावक को अपने कंधों पर लाद लिया और उसके अगले और पिछले पैरों को अपने दाहिने और बाँए हाथों में मज़बूती से पकड़ लिया। फ़िर थोड़ा सा आगे की ओर झुक कर तेज़ी से कोदू के पीछे-पीछे हो लिया। भूरा की गतिविधियों पर नज़र रखते हुए और पीड़ित हिरन की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए परमा भूरा के पीछे-पीछे चल पड़ा। 

तीनों की टोली कोदू के घर की ओर तेज़ी से बढ़ रही थी ताकि शीघ्र ही हिरन के घाव पर डम्हा लगाया जा सके। वे जैसे-जैसे कबीले के घरों के नज़दीक पहुँच रहे थे वैसे-वैसे माँस के भुनने की खुशबू और बाजरे की रोटियों के सिकने की सौंधी- सौंधी महक उनकी भूख भड़काती जा रही थी। कबीले की किशोरियाँ सर पर कलेवा की पोटलियाँ रखे हुए पालतू गाय-बकरियों के झुंड को हाँकते हुए चारे के मैदानोँ की ओर जाने लगी थीं। खेर माई के निकट, कबीले के कुत्ते झुंड से बाहर निकलने वाली बकरियों का पीछा कर उन्हें वापस झुंड में खदेड़ रहे थे। 

रोज़ की तरह, दूसरे पहर की गतिविधियों ने कबीले की हलचल को चरम सीमा पर पहुंचा दिया था। पर इन सबसे बेखबर कोदू की टोली घायल मृग को उठाए हुए तेज़ी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ी जा रही थी। 

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शेष अगले अंक में क्रमशः
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24-अक्तूबर-2011
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