Harish Jharia

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02 December 2011

eNovel: Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone) : Episode- 11

Patthar kii Ibaarat (Smallest)

Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2011 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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उपन्यास: पत्थर की इबारत © एपीसोड- 11

© Harish Jharia

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ… Episode-10:

तीनों की टोली कोदू के घर की ओर तेज़ी से बढ़ रही थी ताकि शीघ्र ही हिरन के घाव पर डम्हा लगाया जा सके। वे जैसे-जैसे कबीले के घरों के नज़दीक पहुँच रहे थे वैसे-वैसे माँस के भुनने की खुशबू और बाजरे की रोटियों के सिकने की सौंधी- सौंधी महक उनकी भूख भड़काती जा रही थी। कबीले की किशोरियाँ सर पर कलेवा की पोटलियाँ रखे हुए पालतू गाय-बकरियों के झुंड को हाँकते हुए चारे के मैदानोँ की ओर जाने लगी थीं। खेर माई के निकट, कबीले के कुत्ते झुंड से बाहर निकलने वाली बकरियों का पीछा कर उन्हें वापस झुंड में खदेड़ रहे थे। 

रोज़ की तरह, दूसरे पहर की गतिविधियों ने कबीले की हलचल को चरम सीमा पर पहुंचा दिया था। पर इन सबसे बेखबर कोदू की टोली घायल मृग को उठाए हुए तेज़ी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ी जा रही थी…

और आगे…

कोदू के चलने की रफ़्तार बहुत तेज़ थी। उसके हर कदम के साथ ऐसा लगता था कि धरती में कंपन हो रहा हो। उसके घुटनों के ठीक ऊपर उभरी हुई मज़बूत माँसपेशियाँ पैरों के वेगपूर्ण परिचालन के साथ-साथ उछलती जा रही थीं। उसके पैरों के कठोर नुकीले नाखून, पंजों से रास्ते पर गहरे खरौंच के निशान छोड़ते जा रहे थे। ठोस मोटे बाँस को फ़ाड़कर बनाए गए भारी धनुष की प्रत्यंचा खोलकर उसपर कस कर लपेटी हुई थी और कोदू ने उसे लाठी की भाँति अपने कधों के आर-पार आड़ा थाम रखा था। चमड़े के कमर-पट्टे से धारदार कुल्हाड़ी की लंबी मूठ उसके घुटनों तक झूल रही थी।

कोदू के ठीक पीछे उसी की रफ़्तार और चाल से उसका बेटा परमा, कदम से कदम मिला कर चल रहा था। दौनों की आकृतियाँ हूबहू एक जैसी नज़र आ रही थीं और भूरा उन दौनों के पीछे-पीछे लगभग दौड़ लगा रहा था। घायल मृगछौने को अपने कंधों पर लादे हुए उसकी कमर झुक गई थी। वह आगे चले जा रहे परमा के पैरों के नाखूनों के निशानों को रास्ते पर देखता हुआ मुश्किल से उनका पीछा कर रहा था।  

सुबह से अपने-अपने घरों में कैद कबीले के बच्चे बाड़ों के प्रवेश द्वारों पर लगे अड़ियों को थामे, बाहर रास्ते पर भागे जा रहे कोदू और दौनों युवकों की ओर उत्सुकता से देख रहे थे। तब तक सभी को पता चल चुका था कि भूरा ने हिरन के बच्चे को बिना किसी प्रयोजन के घायल कर दिया था और उसे सरदार मिरगा बीर ने सज़ा सुना दी थी। यही कारण था कि बच्चों के लिए भूरा की गतिविधियाँ एक तमाशा बनी हुई थीं।

कबीले की किशोरियॉ अपने-अपने ढोर-बछेरू हाँकती हुई नदी की ओर तेज़ी से भागी जा रही थीं। गायों के रम्भाने और बकरियों के मिमियाने की आवाज़ें उनके खुरों से उड़ती धूल के साथ चारों ओर फ़ैल रही थीं। 

किशोरियों के चेहरे पर किशोरावस्था की गुलाबी आभा दमक रही थी। उन्होंने अपने सर पर कलेवा की पोटलियाँ साध रखी थीं और अपने-अपने पशुओं के झुंडों के पीछे अलबेली चाल से भागी जा रही थीं। कबीले की अन्य नारियों जैसे ही किशोरियाँ, कमर से घुटनों तक की धोती काँच लगा कर पहने हुए थीं और उनकी सुडौल पिंडलियाँ नज़र आ रही थीं। उस आयु तक लड़कियों को घुटने से नीचे पंजे तक चमड़े की पट्टियों कसना आवश्यक नहीं था क्योंकि तब तक उन्हें पेड़ों पर चढ़ने और छलांग लगाने की अनुमति नहीं थी। 

उन्होंने अपने अंगोछे गरदन से लेकर, वक्ष के गिर्द लपेटते हुए, पीठ पर लेजाकर, सरफूंद की शक्ल में बाँध रखे थे। अंगोछे के दौनों सिरे उनके पीछे कमर तक झूल कर एक अलग ही छटा बिखेर रहे थे। उन्होंने कमर में चमड़े के पट्टे कसे हुए थे जिसमें छोटी कुल्हाड़ी और हँसिया लटके हुए थे। उनके लंबे बाल, जिनके छोर धूप से सुनहरे होगए थे, हवा के झौकों के साथ मुख पर बिखर रहे थे। रह-रह कर वे सर को झटक कर बालों को पीछे कर लिया करती थीं और बड़ी-बड़ी आँखें झपकाकर बिरौनियों को सुलझाने की कोशिश कर रही थीं। दूसरे पहर की तेज़ बयार चल पड़ी थी और चारों ओर फ़ैले जंगल के घने वृक्षों से टकराकर हवा के थपेड़े साँय-साँय की आवाज़ पैदा कर रहे थे।  
  
कबीले के कुत्ते एकसाथ भौंक रहे थे और पशुओं को खदेड़कर वापस उनके झुंडो तक पहुँचाकर रहे थे। कुछ ही पल में कोदू दौनों नौजवानों के साथ अपने घर के सामने पहुंच गया। अड़िया के बीचों-बीच उसकी आठ वर्षीय बेटी बिन्नी खड़ी हुई, उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। अपने पिता और भाई को आया देखकर बिन्नी खुशी से उछलने लगी। वह शीघ्र ही अड़िया हटाने के लिए उसके एक छोर पर पहुँची और लकड़ी की भारी बल्ली को उठाने की कोशिश करने लगी। बिन्नी पूरी ताकत लगाने के बावजूद वज़नदार अड़िये को हिला भी नहीं पाई। तब तक परमा उसके सामने जाकर खड़ा हो गया और बिन्नी को स्नेह पूर्वक देखते हुए मुस्कुराने लगा। 

तबतक विशालकाय कोदू रुककर अपने भारी भरकम धनुष को ज़मीन पर टिका परमा के साथ  खड़ा हो गया था। भूरा तब भी हिरन को कधों पर लादे हुए अपनी नज़रें ज़मीन पर गड़ाए हुए खड़ा था। परमा ने बिन्नी के सुर्ख गालों को पकड़कर हल्के से दाँए-बाँए हिला दिया तो बिन्नी शरारत से डरने का अभिनय करती हुई माँ को पुकारने लगी -
“अरी माई री… ई… ई…ई…”

“अरी मोड़ी…! मलगा बहुत भारी है… नै उठहै तो सें…” 
कहकर परमा ने एक हाथ में धनुष थामे हुए दूसरे हाथ से अड़िया उठाकर नीचे गिरा दिया। कोदू और भूरा भीतर की ओर तेज़ी से बढ गए और बिन्नी परमा के साथ वहीं रुक गई। परमा ने शीघ्र ही अड़िए को दुबारा उसके स्थान पर लगाया और बिन्नी का हाथ पकड़कर अपने पिता की ओर भागा। 

कोदू तेज़ी से घौंसलेनुमा मिट्टी के घर के निकट पहुँचा। उसने अपना धनुष दीवार से टिका कर खड़ा कर दिया और विभिन्न शस्त्रों सहित अपना चमड़े का कमर पट्टा उतारा और दीवार के किनारे फ़र्श पर सावधानी से रख दिया। फ़िर वह तेज़ी से अपने बाँए ओर मुड़ा और त्वरित गति से झिरिया के पास पहुँच गया। उसने अपना एक घुटना झिरिया की नम रेत पर जमाया और अंजुली भर-भर कर बहुत सारा पानी पी गया। 

पानी पीते ही उसे एक लंबी सी डकार आई और वह घुटने पर हाथ टेक कर उठ खड़ा हुआ। उसने अपना सर घुमा कर घर की ओर देखा और परिवार की गतिविधियों का अंदाज़ा लगाता हुआ लंबे-लंबे डग भरता हुआ घर की ओर मद्धम गति से चल पड़ा।

परमा और बिन्नी एक दूसरे का हाथ पकड़े, दौड़ते हुए माँ के पास रसोई तक आए। बिन्नी अपनी माँ का हाथ बटाने वापस उसके पास पहुँच गई और परमा अपने शस्त्र पिता के हथियारों के नज़दीक रखकर पानी पीने के लिए झिरिया की ओर बढ़ गया। 

कोदू की पत्नी नौनी, टटिया के पीछे अनवरत जल रहे अलाव के ऊपर, आड़े ठोस बाँस में छेदकर लटकाए हुए शिकार को भून रही थी। साथ ही साथ वह अलाव में ही एक ओर बने चूल्हे के कल्ले पर, बाजरे की रोटियाँ भी सेकती जा रही थी। बिन्नी वापस अपनी माता का काम बटाने के लिए नौनी के पास पहुंच गई थी। वह चूल्हे की राख हटाती जा रही थी और आवश्यक मात्रा में अलाव से जलते हुए अंगार खींच कर चूल्हे में सरकाती जा रही थी। नौनी टटिया के खम्भे से टिकी उकड़ूँ बैठी हुई दौनों हथेलियों से बाजरे की रोटी थोप रही थी। वह अपनी बड़ी-बड़ी आँखों के कोरों से बेटी की ओर स्नेह भरी नज़रों से देखती जा रही थी। 

कोदू गोलाकार घर की दीवार के निकट पहुंचा और घर के इर्द-गिर्द बनी दो हाथ चौड़ी फ़र्श की पट्टी पर दीवार से टिक कर उकड़ूँ बैठ गया। वह अपने सामने खड़े भूरा से बोला-
“ए रे भूरा…! तैं काए मूड़ लटकाएँ खड़ो है…? बच्छा हे नीचैं बिठार दे और डम्हा की तैयारी कर्…।

भूरा भय और संकोच के कारण जैसा आया था वैसा ही खड़ा हुआ था। कोदू की आवाज़ सुनकर वह चौंका और शीघ्र ही उसने मृगशावक को नीचे घास पर सावधानी पूर्वक उतार दिया। मृग ने चारों पैरों पर खड़े होने का प्रयास किया किंतु वह खड़ा नहीं हो पाया और धरती पर गिर गया। उसने अगले दौनों पैरों को मोड़कर अपना धड़ सीधा कर लिया। फ़िर पिछले घायल पैर को सीधा पसारे हुए अपनी गरदन को ऊपर ऊँचा उठाकर चारों ओर देखने लगा। 

भूरा दौड़कर नौनी के पास रसोई में पहुँच गया। उसने खन्भे की खुटियों से लटके दो हँसिये उतारे और उनकी नौंकों को अलाव के अंगारों में दबा दिया। फ़िर वहीं उकड़ूँ बैठकर उनके गरम होने की प्रतीक्षा करने लगा। उसे लगातार अनुभव हो रहा था कि नौनी और उसकी नन्हीं बेटी बिन्नी कनखियों से उसे घूरे जा रही थीं। वह अपनी नज़रें अंगारों में दबे हसियों की ओर गड़ाए हुए था। भुनते हुए शिकार की खुशबू उसकी भूख भड़का रही थी और अपने गुनाह का पश्चाताप उसे बेचैन और विचलित किए हुए था। 

परमा शीघ्र ही रसोई में पहुँच गया। उसने हँसियों की मूठ पकड़कर उन्हें निकाला और देखा कि वह तपकर लाल हो गई थीं। उसने एक हँसिया पुनः आग में दबा दिया और दूसरे को लेकर दौड़ता हुआ पिता के पास पहुँच गया। कोदू ने फ़ौरन चिनगारी छोड़ते गरम हँसिये को मूठ से पकड़ा और मृग के घाव पर उसकी जलती हुई नोंक को सावधानी पूर्वक फ़ेर दिया। तब तक परमा ने मृग के चारों पैर पकड़ लिए थे और एक घुटने से उसके धड़ को काबू में कर लिया। बछड़ा एकाएक चीखा और फ़ड़फ़ड़ाया पर परमा ने उसे पूरे नियंत्रण में पकड़कर रखा हुआ था। 

अगले ही पल भूरा दूसरे गरम हँसिए को लेकर आ गया और कोदू ने वही शल्यक्रिया पुनः दोहरा दी। कुछ ही पल में ड्म्हा की प्रक्रिया पूर्ण हुई और परमा ने जड़ी-बूटियों का गाढा लेप मृग के घाव पर लगा दिया। क्षणिक पीड़ा सहन करने और लेप की ठंडक अनुभव करने के बाद बछड़े की आँखों में चमक वापस आ गई और वह कान घुमा-घुमा कर चारों ओर की आहट लेने लगा। कोदू के चेहरे पर सतोष का भाव उभर आया और परमा खुशी से उछल पड़ा। भूरा भी अपने अपराधबोध की वेदना से बाहर आ गया और उसने कमर सीधी करके पहली बार अपना सर ऊपर उठाया और हल्का सा मुस्कुराया। 

मृग की शल्यक्रिया (डम्हा) के दौरान बिन्नी ने आँखें मीच कर दौनों हाथों से अपना चेहरा ढँक लिया था और नौनी के पीछे छुप गई थी। उसे जैसे ही डम्हा की क्रिया पूर्ण होने के सकेत मिले वह दौड़कर बछड़े के पास पहुँच गई और उसकी पीठ सहलाने लगी।

नौनी ने अलाव पर भुनते हुए शिकार का निरीक्षण किया तो पाया कि वह तैयार हो चुका था। उसने रस्सों के फ़ंदों के सहारे झूलते बाँस सहित शिकार को नीचे उतारा और वैसी ही शैली में, कमर तक ऊँचाई के ज़मीन में गड़े दो लकड़ी के खूटों के सहारे आड़ा रख दिया। 

सूरज सर के ऊपर आ गया था और दोपहर के भोजन का समय भी हो चुका था। ज़मीन के समानांतर टंगे बाँस के बीचों-बीच छिदे हुए ताज़ा गरम शिकार की सुगंध चारों ओर फ़ैल रही थी। नौनी गरम-गरम शिकार पर पिसा नमक छिड़कती जा रही थी और साथ ही साथ महीन पीसी हुई हरी मिर्च और हरी धनिया का मिश्रण भी लगाती जा रही थी। अत्यधिक गर्म शिकार पर मसालों के स्पर्ष मात्र से ही चड़-चड़ की आवाज़ के साथ खुशबूदार भाफ़ निकल पड़ती थी और मसाला भोजन में भीतर तक प्रवेश करता जाता था। मसालों के लेप के बाद नौनी रसोई से रोटियों भरी बाँस की टोकरी उठा लाई और स्थिर खड़ी होकर शिकार से निकलती चड़-चड़ की आवाज़ के रुकने की प्रतीक्षा करने लगी। 

भुने शिकार के दौनों ओर बैठ्ने के लिए आठ चौकोर पत्थर, जिन्हें टिपटी पुकारा जाता था, रखे हुए थे ताकि सामूहिक भोज्य पदार्थ के निकट बैठकर सुविधा पूर्वक भोजन किया जा सके। शिकार के अलाव से उतारते ही परिवारजन अधिक प्रतीक्षा किए बिना भोजन करने के लिए उतावले होने लगे। कोदू ने भूरा की पीठ थपथापाकर भोजन में शामिल होने का संकेत किया और टिपटियों पर जाकर बैठ गए। कोदू, परमा और भूरा को बैठते ही गरम शिकार की आँच चेहरे पर अनुभव होने लगी, जबकि बिन्नी पहले ही उस ताप से बचने के लिए परमा के पीछे उसके गले में बाहें डालकर लटक गई थी। 

नौनी ने उन्हें शिकायत भरी नज़रों से देखा जैसे कहना चाह रही हो कि “थोड़ी भी प्रतीक्षा नहीं हो पाई?” फ़िर उसने मुँह बिचकाते हुए रोटी की टोकरी कोदू के नज़दीक रख दी और पुनः कमर पर एक हाथ रख कर बड़ी-बड़ी बिरौनियाँ झपकती हुई शिकार के तैयार होने की राह देखने लगी।

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Synonims: 
अड़िया= crude gate made of a wood log placed horizontally on two supports; खदेड़= drive away; माँसपेशियाँ= muscles; खरौंच= scratch; प्रत्यंचा= bow string; कुल्हाड़ी= axe; मूठ= long wooden handle; घुटनों= knees; हूबहू= identical; मृगछौने= calf of a deer; अड़ियों= crude wooden gate; प्रयोजन= purpose; गतिविधियाँ= activities; तमाशा= stunt; किशोरावस्था= adolescence; झुंडों= herd; सरफूंद= french knot; अंगोछे= scarf; हँसिया= sickle; बिरौनियों= eye leshes; बयार= breeze; मलगा= wooden log; झिरिया= cascade ; अंजुली= handful; डकार= burp; शल्यक्रिया= surgery; जड़ी-बूटियों= hurbs; अपराधबोध= guilt; बाड़ों= गाय-बकरी fence; मलगा= wood log; कल्ला= मिट्टी का तवा, terracotta griddle, terracotta hotplate; मूड़= सर, head; अलाव= bonfire; खूटों= baton; मूड़= head; नियंत्रण= Control; सूरज= the sun; आँच= heat; शिकायत= complaint; शिकार= prey, hunt; टिपटी= stone cubes used as seats
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शेष अगले अंक में क्रमशः Episode-12:
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Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
Opening Page:  Preface:  Introduction:  Episode-1:  Episode-2:  Episode-3:  Episode-4:  Episode-5:  Episode-6:  Episode-7:  Episode-8:  Episode-9: Episode-10: : Episode-11: Episode-12: Episode-13; Episode-14  
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This is a work of fiction and all the characters, story, incidents, culture, social life, evolution, developments etc are all imaginary. This article / Story / fiction is written based on my personal observations and imagination. My intention for publishing the same is to provide healthy reading and intellectual entertainment and not for educating the visitors. Names of people, societies, communities and description of faiths, beliefs, incidents are imaginary and fictitious. They have neither any relevance to the prevailing entities and traditions nor have any similarities with ongoing lifestyles, political ideologies and legal doctrines. The contents of this creative work have not been written with any intention to criticize, condemn or oppose anything what-so-ever present in reality in any country in the world. No literature or authentic books have been referred for writing the contents of this article. The visitors are advised not to refer the contents of this article for any research or testimony on scientific, geographical, political, civic, social or legal purposes. The visitors are further advised to consult relevant experts before adapting any information from this article. The author or the website are not responsible for any errors, mistakes, or omissions there in.
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०३ दिसम्बर २०११

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