Harish Jharia

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19 January 2012

eNovel: Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone) Episode- 12


Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2012 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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उपन्यास: पत्थर की इबारत © एपीसोड- 12

© हरीश झारिया

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ… 

भुने शिकार के दौनों ओर बैठ्ने के लिए आठ चौकोर पत्थर, जिन्हें टिपटी पुकारा जाता था, रखे हुए थे ताकि सामूहिक भोज्य पदार्थ के निकट बैठकर सुविधा पूर्वक भोजन किया जा सके। शिकार के अलाव से उतारते ही परिवारजन अधिक प्रतीक्षा किए बिना भोजन करने के लिए उतावले होने लगे। कोदू ने भूरा की पीठ थपथापाकर भोजन में शामिल होने का संकेत किया और टिपटियों पर जाकर बैठ गए। कोदू, परमा और भूरा को बैठते ही गरम शिकार की आँच चेहरे पर अनुभव होने लगी, जबकि बिन्नी पहले ही उस ताप से बचने के लिए परमा के पीछे उसके गले में बाहें डालकर झूल गई थी। 

नौनी ने उन्हें शिकायत भरी नज़रों से देखा जैसे कहना चाह रही हो कि “थोड़ी भी प्रतीक्षा नहीं हो पाई?” फ़िर उसने मुँह बिचकाते हुए रोटी की टोकरी कोदू के नज़दीक रख दी और पुनः कमर पर एक हाथ रख कर बड़ी-बड़ी बिरौनियाँ झपकती हुई शिकार के तैयार होने की राह देखने लगी। 

और आगे…

देर तक अलाव की तेज़ आँच के ऊपर भुनते रहे साबुत शिकार में भीतर तक इतना ताप इकट्ठा हो जाता था कि उसे सीधे-सीधे काटकर खाना संभव नहीं हुआ करता था। अलाव से उतारने के बाद भी शिकार की सतह से तेज़ आँच उठती रहती थी। शिकार को भीतर तक पकाने के प्रयोजन से उस पर आगे से पीछे तक लबाई में गहरे चीरे लगाए जाते थे। जिनके रास्ते अलाव की आँच भीतर तक प्रवेश कर सके। पकने की अंतिम स्तिथि पर पहुँचते-पहुँचते व्यंजन की सतह गहरे कत्थई रंग की हो जाया करती थी और चीरे गहरे लाल रंग के ही हो पाया करते थे। 

व्यंजन पर सही रंग आने पर नौनी ने बाँस में छिदे शिकार को अलाव से उतार कर दौनों ओर खूंटियों के सहारे से लटका दिया था। फ़िर बारी थी बघार लगाने की। उसने पहले ही अलाव की आग में एक मिट्टी की सँकरे मुँह की डबुलिया (लुटिया) जंगली तिल के तेल से आधा भर कर अलाव के अंगारों पर गरम होने के लिए रख दी थी। उसने एक सख्त हरी लता डबुलिया की गर्दन के गिर्द लपेट कर एक हाथ से मज़बूती से पकड़ रखी थी और तेल से धुआँ निकलने की प्रतीक्षा कर रही थी। जैसे ही तेल से धुआँ निकलना आरंभ हुआ वैसे ही नौनी ने दूसरे हाथ से मुट्ठी भर कूटी हुई लाल मिर्च डबुलिया में डाल दी। 

खौलते हुए तेल में मिर्च के पड़ते ही डबुलिया के मुँह से आग का भभूका निकला और ज्वालाएं उठने लगीं। परिवारजन बघार की तीखी गंध और मिर्च कि चरपराहट से खाँसने लगे और शीघ्र ही अपने स्थान से उठ कर दूर खड़े हो गए। नौनी बघार की डबुलिया हाथ में पकड़े हुए ही शिकार के नज़दीक आकर तैयार खड़ी हो गई। साथ ही परमा भी एक क्षण में शिकार में छिदे बाँस के एक छोर पर खूंटी के पास जा खड़ा हुआ। उसने बाँस के छोर पर कसे हुए मूठ को पकड़कर शिकार को स्थिर स्थिति में थामकर रखा। नौनी ने तुरंत ही व्यंजन के ऊपरी चीरे में खौलते तेल का बघार लगा दिया। परमा ने शिकार को घुमाकर दूसरे चीरे को ऊपर की दिशा की ओर किया और उसकी माई ने दूसरा बघार उस चीरे में लगा दिया। इसी प्रकार पूरे व्यंजन के सभी चीरों पर नौनी ने बघार देने के पश्चात बचा हुआ गरम तेल चौतरफ़ा व्यंजन पर बिखेर दिया। परमा शिकार में छिदे बाँस को लगातार धीमी और संयत गति में घुमाता रहा ताकि बघार का तेल व्यंजन से नीचे ना टपक पाए और पूरा का पूरा उसके भीतर समा जाए।

पूरा वातावरण स्वादिष्ट भोजन की सुगंध से भर गया। परिजनों के मुँह में पानी भर आया और उनकी भूख भड़क उठी। उनसब के बीच, एक भूरा ही था जो परिवार से बाहर का था। वह विस्मयपूर्ण दृष्टि से कोदूबीर के परिवार की उत्कृष्ट पाककला का अद्भुत नज़ारा देख रहा था। उसने अभी तक अपने घर में शिकार के बेतरतीब टुकड़ों को अलाव के अंगारों पर पका-अधपका भूनते हुए ही देखा था, जिन्हें वह अपने माता-पिता के साथ बैठकर बेमन से चबा कर निगल जाया करता था। वह नौनी काकी की ओर टकटकी लगाए देख रहा था जो एक तेज़ छुरी की सहायता से, सफ़ाई के साथ शिकार के चीरों के बीच से, चौकोर और तिकोने टुकड़े काट-काट कर सभी को देती जा रही थी। 

काकी ने जैसे ही व्यंजन का एक खुशबूदार टुकड़ा भूरा की ओर बढ़ाया वैसे ही उसने उसे उसके हाथ से लपक लिया और बड़े-बड़े कौर खाने लगा। सभी परिजनों ने शिकार के साथ बाजरे की मोटी-मोटी, सोंधी खुशबू छोड़ती हुई नमकीन रोटियाँ पेटभरकर खाईं और झिरिया पर जाकर खूब पानी पिया।

दूसरे पहर का सूरज ठीक सरपर आ चुका था। पेड़ों की छायाएँ उनके नीचे सिमट आईँ थीं। कबीले में जैसे-जैसे सुबह की हलचल और भोजन तैयार करने की लंबी और कठिन प्रक्रिया समाप्त होती जा रही थी वैसे-वैसे दोपहर की शांति चारों ओर पसरती जा रही थी। 

झिरिया पर कोदू पानी पीकर खड़ा हुआ और “ओई… हाँ…” की आवाज़ के साथ लम्बी डकार ली। फ़िर वह आकर घर की दीवार से टिककर एक पैर फ़ैलाकर बैठ गया। दूसरे पैर का घुटना ऊपर उठाए हुए उसने आधा मोड़ा और अपना हाथ उस घुटने के ऊपर टिकाकर आगे की ओर लंबा फ़ैला दिया। दूसरे हाथ की हथेली उसने मिट्टी से बनाए गए समतल फ़र्श पर टिका दी और अपने लंबे-लंबे नाखूनों से हल्के-हल्के कुरेदने लगा।

कोदू की यह विशिष्ट मुद्रा उसके प्रशासनिक रुख को दर्शाती थी। नौनी ने रसोई की परछी की सफ़ाई करते हुए आँखों के कोरों से कोदू का यह रूप देख लिया और समझ गई कि अब वह परमा और भूरा को बुलाएगा और उन्हें अगले दो पहरों में किए जाने वाले कार्यों के आदेश सुनाएगा। भूरा और परमा झिरिया से पानी पीकर वापस आरहे थे और बिन्नी धूप में अपनी आँखें मिचमिचाते हुए परमा दद्दा का हाथ दौनों हाथों से अपने शरीर से चिपटाकर पंजों पर हल्के-हल्के उछलते हुए उसके साथ चली आ रही थी। 

जैसे ही बिन्नी की दृष्टि कोदूबीर पर पड़ी, उसे समय की नज़ाकत समझते देर नहीं लगी। उसने एकाएक भाई का हाथ छोड़ा और भागकर माँ के पास पहुंचकर उसका हाथ बटाने का अभिनय करने लगी। परमा भी अविलब सतर्क हो गया और तेज़ी के साथ अपने पिता के सामने जाकर खड़ा हो गया। भूरा पुनः अपनी पुरानी भयभीत मुद्रा में कोदूबीर के सामने परमा की आड़ लेकर अपने शरीर में होने वाले कंपन पर नियंत्रण करते हुए कबीले के सरदार के बाद दूसरे सर्वाधिक शक्ति सम्पन्न पदाधिकारी के आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।  

अगले ही क्षण कोदू की गंभीर गरजदार आवाज़ ने परमा और भूरा को सतर्क कर दिया। वह बोला-
“काए रे भूरा… तोहे अपने करम पै कछू पछतावा तो हो रहो हूहै… अब बारी है तोरी सजा की… जौन तोहे मिरगाबीर ने सुनाई है…”
और कोदू ने अपने आदेशों, सावधानियों और चेतावनियों को विस्तार पूर्वक भूरा और परमा को समझाना आरभ किया। परमा को भूरा की सज़ा का पर्यवेक्षण करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था, इसलिए भूरा के साथ-साथ परमा भी अपने पिता के आदेशों को ध्यानपूर्वक सुनता जा रहा था।  

दूसरे पहर का सूरज ठीक सर पर आ चुका था और दौनों नवयुवक तेज़ धूप में खड़े हुए परमा की घोषणाओं को ध्यान पूर्वक सुन रहे थे। आदेशों की घोषणा के दौरान परमा अपने स्थान पर स्थिर खड़ा हुआ था और भूरा रह रह कर अपने शरीर का भार एक पैर से दूसरे पैर पर बदलता जा रहा था। उसका सफ़ेद चेहरा लाल सुर्ख हो गया था और उसके कंधे, वक्ष और बाहें पर भी ललामी फ़ैलती जा रही थी। सूर्य की तेज़ रौशनी में उसे चकाचौंध लग रही थी और वह बड़ी मुश्किल से आँखें मिचमिचा कर कोदू की ओर देख पा रहा था।   

कोदू ने हिरन के स्वास्थ्यलाभ के लिए दो पखवाड़े और भूरा के व्यायाम और प्रशिक्षण के लिए चार पखवाड़े का समय तय किया। दैनिक कार्यक्रम के अनुसार भूरा को परमा के साथ, सूर्योदय से पूर्व ही नज़दीक की करियाटेकरी पहाड़ी की तलहटी तक दौड़कर जाना था। तलहटी से करियाटेकरी की चोटी तक और वहाँ से फ़िर तलहटी तक दौनों को तेज़  रफ़्तार से चढ़ना और उतरना था। इस प्रकार उन्हें दस चक्कर लगाने थे। फ़िर पहाड़ी से बहते हुए झरने से बनी निर्मल मीठे जल से भरी हुई करियाझीर नामक झील से पानी पीकर और कुछ विश्राम करने के पश्चात उन्हें युद्धकला का प्रशिक्षण आरंभ करने का निर्देश प्राप्त हुआ था। यह प्रशिक्षण उन्हें दूसरे पहर के समाप्त होने के कुछ ही पहले तक जारी रखना था ताकि भोजन काल तक वे कबीले में अपने-अपने घर वापस पहुँच सकें।

कोदू के आदेशानुसार करियाझीर से लौटकर, भूरा को घायल हिरन की सेवा-सुश्रुषा में लग जाना था। मृग शावक के इलाज और देख-भाल में जो कार्य शामिल थे वह थे उसे उठाकर नदी तक लेजाकर पानी पिलाना, नहलाना और उसके घाव की सफ़ाई करना्। इसके पश्चात भूरा को उसे उठा कर वापस परमा के घर तक लाना था और घाव पर जड़ी-बूटी का लेप कर उसके खाने के लिए ताज़ी मुलायम दूब और झाड़ियों की पत्तियाँ डालनी थीं। इतना काम समाप्त होने के बाद भूरा अपनी व्यक्तिगत दिनचर्या का पालन करने के लिए स्वतंत्र था। 

कोदू के निर्देशों को भूरा और परमा ध्यान पूर्वक सुनते रहे। काम बड़ी मेह्नत का था और समय की पाबंदी के साथ-साथ सख्त अनुशासन की बातें सुन कर भी दौनों नवजवानों के चेहरों पर एक शिकन तक नहीं आ रही थी। इसका पहला कारण था कबीले की उच्चकोटि की कानून व्यवस्था और दूसरा कारण था करियाटेकरी का खूबसूरत इलाका जहाँ इन्हें अगले चार पखवाड़ों तक रोज़ आधा दिन बिताना था। दौनों के मन में भीतर ही भीतर खुशी भी हो रही थी कि अगले चार पखवाड़े उन्हें कबीले के सबसे मनमोहक और रमणीक वातावरण में बिताने थे। 

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Synonims: तिल= sesame, अद्भुत= amazing; नज़ाकत= sensitivity; भभूका= blast; चकाचौंध= dazzle, glare; प्रशिक्षण= training; घोषणाओं= announcements; दूब= couch grass; करियाझीर= black lake, name of the lake / lagoon;  पखवाड़ों= fortnights;   पाबंदी= restrictions;  अनुशासन= discipline;  करियाटेकरी= black hill, name of the hill; डबुलिया (लुटिया)= small earthen pot for heating cooking oil; पर्यवेक्षण= supervision; अड़िया= crude gate made of a wood log placed horizontally on two supports; खदेड़= drive away; माँसपेशियाँ= muscles; खरौंच= scratch; प्रत्यंचा= bow string; कुल्हाड़ी= axe; मूठ= long wooden handle; घुटनों= knees; हूबहू= identical; मृगछौने= calf of a deer; अड़ियों= crude wooden gate; प्रयोजन= purpose; गतिविधियाँ= activities; तमाशा= stunt; किशोरावस्था= adolescence; झुंडों= herd; सरफूंद= french knot; अंगोछे= scarf; हँसिया= sickle; बिरौनियों= eye leshes; बयार= breeze; मलगा= wooden log; झिरिया= cascade, fountain; अंजुली= handful; डकार= burp; शल्यक्रिया= surgery; जड़ी-बूटियों= hurbs; अपराधबोध= guilt; बाड़ों= गाय-बकरी fence; मलगा= wood log; कल्ला= मिट्टी का तवा, terracotta griddle, terracotta hotplate; मूड़= सर, head; अलाव= bonfire; खूटों= baton; मूड़= head; नियंत्रण= Control; सूरज= the sun; आँच= heat; शिकायत= complaint; शिकार= prey, hunt
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शेष अगले अंक में क्रमशः
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Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
Opening Page:  Preface:  Introduction:  Episode-1:  Episode-2:  Episode-3:  Episode-4:  Episode-5:  Episode-6:  Episode-7:  Episode-8:  Episode-9: Episode-10: : Episode-11: Episode-12: Episode-13; Episode-14  
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अगला एपीसोड शीघ्र ही आ रहा है...
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This is a work of fiction and all the characters, story, incidents, culture, social life, evolution, developments etc are all imaginary. This article / Story / fiction is written based on my personal observations and imagination. My intention for publishing the same is to provide healthy reading and intellectual entertainment and not for educating the visitors. Names of people, societies, communities and description of faiths, beliefs, incidents are imaginary and fictitious. They have neither any relevance to the prevailing entities and traditions nor have any similarities with ongoing lifestyles, political ideologies and legal doctrines. The contents of this creative work have not been written with any intention to criticize, condemn or oppose anything what-so-ever present in reality in any country in the world. No literature or authentic books have been referred for writing the contents of this article. The visitors are advised not to refer the contents of this article for any research or testimony on scientific, geographical, political, civic, social or legal purposes. The visitors are further advised to consult relevant experts before adapting any information from this article. The author or the website are not responsible for any errors, mistakes, or omissions there in.
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npad
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24 दिसम्बर 2011 से 19-जनवरी-2012
शब्द- 1620

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