Harish Jharia

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19 November 2012

eNovel: Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone) Episode- 13


Exclusively written for “Discover Life”

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Copyright © 2012 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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उपन्यास: पत्थर की इबारत (एपीसोड- 13)

© हरीश झारिया

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ…  

कोदू के निर्देशों को भूरा और परमा ध्यान पूर्वक सुनते रहे। काम बड़ी मेह्नत का था और समय की पाबंदी के साथ-साथ सख्त अनुशासन की बातें सुन कर भी दौनों नवजवानों के चेहरों पर एक शिकन तक नहीं आ रही थी। इसका पहला कारण था कबीले की उच्चकोटि की कानून व्यवस्था और दूसरा कारण था करियाटेकरी का खूबसूरत इलाका जहाँ इन्हें अगले चार पखवाड़ों तक रोज़ आधा दिन बिताना था। दौनों के मन में भीतर ही भीतर खुशी भी हो रही थी कि अगले चार पखवाड़े उन्हें कबीले के सबसे मनमोहक और रमणीक वातावरण में बिताने थे।

और आगे…

उस रोज़ का आधा दिन बीत चुका था. भूरा अपनी जगह पर खड़ा हुआ कभी परमा की और देखता तो कभी कोदू की ओर. उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि वह आखिर करे तो करे क्या. उसे मन ही मन परमा से भी शिकायत हो रही थी कि वह आगे क्यों नहीं आता और उसे बताता कि उसे क्या करना चाहिए. 

जीवन में पहली बार भूरा का कबीले के कद्दावर लड़ाके कोदू बीर सामना हुआ था और उसी की देखरेख में सरदार मिरगा बीर द्वारा सुनाई गई सज़ा भुगत रहा था. बावजूद इसके कि कोदू बीर उसके साथ नरमी से पेश आ रहा था, भूरा हर पल इसी आशंका से भयभीत था कि किसी भी पल कोदू बीर या परमा उसकी किसी गलती से नाराज़ न हो जाएँ. कोदू बीर के पास असीमित कानूनी अधिकार थे. वह मिरगा बीर के द्वारा सुनाई गई सज़ा को कम तो नहीं कर सकता था; परंतु सज़ा को और सख्त करना या उसकी अवधि बढाना उसकी मर्जी पर र्निर्भर करता था. 

भूरा को परमा से जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ. परमा एकाएक आगे आया और भूरा की बाँह पकड़कर उसे लगभग घसीटते हुए घायल मृग के पास ले गया। फ़िर उसने उसे सांकेतिक भाषा में मृगशावक को उठा कर पानी पिलाने के लिए नदी की ओर ले जाने और लौटकर मुलायम घास-पत्ती लाकर देने की हिदायत दी। साथ ही फ़ुसफ़ुसा कर उसे वह सब-कुछ भी समझा दिया जो उसकी समझ में नहीं आ पाया था। 

कोदू सब कुछ ध्यान पूर्वक देख रहा था परंतु उसके चेहरे के हावभाव में कोई परिवर्तन नहीं प्रकट हो रहे थे. भूरा ने कनखियों से कोदू के धीर गंभीर चेहरे को देखा और हिरन के बछड़े को उठाकर अपने कधों पर लाद लिया। फ़िर अपनी गर्दन के दौनों ओर से मृग के अगले और पिछ्ले पैरों को अपने सीने के सामने दौनों हाथों से सावधानी पूर्वक पकड़ा और फ़िर अपने धड़ को हलके से उचका कर बछड़े के शरीर को सुविधा पूर्वक कंधों पर साध लिया। आश्वस्त होने के बाद उसने सर घुमाकर कोदू की ओर देखा और पाया कि कोदू की आँखें एकटक उसके कार्यकलाप पर टिकी हुई थीं। 

कोदू के चट्टान जैसे कठोर चेहरे पर नज़र पड़ते ही भूरा के शरीर में ऊपर से नीचे तक बिजली सी कौंध गई। वह एकाएक ठिठक गया, इस आशंका से कि उसके कर्तव्य पालन में कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई। वह कोदू बीर की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि तभी कोदू ने सकारात्मक संकेत के साथ अपना सर हिलाया। इसके साथ ही भूरा बिना एक क्षण गँवाए पलटकर तेज़ी से बाड़ी के अड़िया कि ओर बढ़ गया। 

उसने एक हाथ से अड़िया हटाया और हल्का सा झुक कर कोदू बीर के घर के आहते से बाहर निकल आया। उसे मन ही मन इस बात की खुशी हो रही थी कि हिरन के बछडे का काम निपटाकर, कुछ ही समय बाद अंततः उसे अपने घर जाने को मिलेगा। घर जाने की इतनी खुशी उसे इससे पहले कभी अनुभव नहीं हुई थी. उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने अपनी माँ को ज़माने से नहीं देखा था. उसे एकाएक अपने पिता कढ़ोरी की और उसकी डाँट-फ़टकार की भी याद आई और उसके चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कराहट फ़ैल गई. कोदू के आहाते से बाहर निकलते ही उसे पल भर के लिए ऐसा लगा जैसे वह चिड़िया बनकर आकाश में उड़ने लगा हो.   

भूरा के क़दमों में एकाएक रफ़्तार आ गई. उसकी नज़रें खेरमाई की मढ़िया के आगे घने पेड़ों के पीछे झिलमिलाते नदी के पानी पर जा टिकीं और वह लंबे-लंबे डग भरता हुआ आगे बढ़ गया. भूरा के हर कदम के साथ हिरन का सर ऊपर-नीचे डोलता जा रहा था और उसके मुँह से लार की पतली सी धारा भूरा के कंधे पर गिरती हुई उसके वक्ष और पीठ की सफेद त्वचा पर फैलती जा रही थी। वह लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ अड़िया के पार निकल गया. 

उधर, हृष्टपुष्ट परमा की तीखी नज़र भूरा की हर हरकत पर टिकी हुई थी. वह उसके पीछे-पीछे अड़िया तक आ पहुंचा और उसपर तब तक नज़रें टिकाए रहा जब तक कि वह खेरमाई की मढ़िया से आगे, नदी के ढालान में उतरने के बाद आँखों से ओझल नहीं हो गया. परमा पसोपेश में था कि कहीं उसने घर के आहाते में रूककर गलती तोनहीं कर दी. एक पल को तो उसे आशंका होने लगी कि कहीं उसके पिता कोदू बीर यह तो नहीं चाह रहे थे कि वह भी भूरा के साथ नदी तक जाता. 

पिता की नाराजगी की बात मन में आते ही उसके माथे पर बल पड़ गए. उसने माथे पर बंधी चमड़े की पट्टी को निकालकर एक हाथ की उंगली में लटका लिया और सर को दांए-बांए झटक कर बालों को सुलझाने लगा. उसने अपना धनुष अड़िया से टिका दिया और दौनों हाथों की उंगलियों को कंधे तक झूल रहे ताँबिया बालों में डालकर सर पकड़कर खड़ा रह गया. सर को दौनों हाथों में थामे वह कभी नदी की दिशा में मुड़कर देखता तो कभी घर की ओर. उसने जोर से अपनी आँखें मींच ली और एक हलकी सी चीख उसके मुंह से निकल गई.   

उसके लहरदार बाल बिखर कर कन्धों को छूने लगे और एक पतली सी लट माथे के आगे आकार आँख के सामने झूलने लगी. उसके वक्ष और भुजाओं की मांसपेशिया उभर आईं और उसका विशालकाय बलिष्ट शरीर एक मनमोहक अदभुत छवि बिखेरने लगा. धर्मसंकट में उलझा हुआ परमा काफी देर तक आँखें मींचे रहा. उसके मन में लगातार पश्चाताप की एक ही बात चुभे जा रही थी कि आखिर वह भूरा के साथ हिरन की परिचर्या के लिए नदी तक क्यों नहीं चला गया. 

वह आँखें खोलकर यथार्थ का सामना करने का साहस जुटाने की कोशिश कर ही रहा था कि कई घोड़ों की टापों की आवाज़ ने उसे चौकन्ना कर दिया. क्षण भर में उसने चमड़े की पट्टी को माथे पर चढाया और आँखें खोलकर आक्रामक मुद्रा में आ गया. उसने लपक कर अड़िया से टिका हुआ धनुष बाँए हाथ में थाम लिया और दूसरे ही पल दाहिने हाथ से तरकश से एक तीर निकाला और कमान पर चढ़ा लिया. फिर बिफरे हुए शेर की तरह शिकारी मुद्रा में शस्त्र को दाहिने-बाँए घुमाने लगा. उसने पाया कि वह चारों ओर से छः घुड़सवारों द्वारा घिरा हुआ था जिनमें से कुछ घर के आहाते से बाहर थे और कुछ अड़िया के भीतर आ चुके थे. 

तभी उसके कानों में पिता कोदू बीर की आवाज़ सुनाई दी, जो उसे आक्रमण नहीं करने की चेतावनी देते हुए उसकी ओर भागता हुआ आ रहा था-
“अरे परमा...आ...आ...! तीर ना चलैए रे... रुक जा... रुक जा... अरे जे तो मिरगा बीर के लड़ाका हैं रे...!” 

परमा का ध्यान पिता की पुकार से अधिक आक्रमणकारी घुडसवारों की ओर केंद्रित था. युद्धकला में पारंगत परमा को जन्म से ही सिखाया गया था कि आक्रमणकारी शत्रु का विनाश ही आपातकाल की सर्वप्रथम आवश्यकता होती है. ऎसी स्थिति में पारिवारिक संबंध और भावनात्मक हस्तक्षेप को वरीयता नहीं दी जा सकती. 

परमा ने क्षण भर में आपातकालीन निर्णय ले लिया और घुडसवारों में से सर्वाधिक हृष्ट-पुष्ट लड़ाके पर निशाना साधकर धनुष की प्रत्यंचा कानों तक खींच ली. उसके तीर के निशाने पर खड़ा घुड़सवार लड़ाका भय से काँप गया. तब तक कोदू बिजली की गति से परमा के पास तक पहुँच पहुंचा और रुकते-रुकते उससे टकरा गया. उसने पीछे से परमा की कमर में अपनी भुजाओं को लपेटते हुए ज़मीन पर दे पटका और साथ ही स्वयं भी इस प्रकार से गिरा कि पुत्र को अधिक चोट नहीं आ पाए. 

पिता के स्पर्श मात्र से ही परमा को वास्तविक स्तिथि का अनुमान हो गया था. उसने अपने विशालकाय शक्तिशाली शरीर की मांसपेशियों को ढीला छोड़ दिया और पिता के साथ-साथ ज़मीन पर आ गिरा. कोदू ने पुत्र को बड़ी कुशलता और सावधानी पूर्वक भुजाओं में भर लिया था और सीने से चिपकाए हुए पहले स्वयं ज़मीन पर गिरा और फिर उसे साथ में लिए हुए काफी दूर तक लुड़कता हुआ चला गया. 

कोदू बीर के आकस्मिक अवतरण के साथ ही सभी लड़ाके घोड़ों से उतर पड़े और कबीले के अनुशासन का पालन करते हुए अपने सेना नायक के सम्मान में चुस्त-दुरुस्त सीधे खड़े हो गए. कोदू बीर और परमा अगले ही पल ज़मीन से उछलकर उठ खड़े हुए और अपने शस्त्रों को धारण करने लगे. 

त्वरित गति से संभलने के साथ ही उसने एक नज़र पिता कोदू पर डाली जो घुडसवारों का ध्यानपूर्वक निरीक्षण कर रहा था. पिता पर दृष्टि पड़ते ही उसके चेहरे पर पश्चाताप का हल्का सा तनाव झलकने लगा. उसे संदेह सा होने लगा कि कदाचित उसने प्रतिरक्षा स्वरूप आक्रामक तेवर अपनाकर कोई गलती तो नहीं कर दी? पिता कोदू द्वारा दूर से भाग कर आना और उसे कमर से पकड़कर गिरा देना ताकि वह आक्रमण नहीं कर पाए, तो यही सिद्ध करता था कि वह कोई गंभीर भूल करने जा रहा था. 

क्षण भर में परमा के मन में इतनी सारी बातें बिजली की भाँती कौंध गईं. एकाएक उसके मन में एक अपराध भावना उत्पन्न हुई जो उसके चेहरे पर हलकी सी उदासी की शक्ल में प्रकट हो गई. उसका शरीर कुछ ढीला सा पड़ गया. उसने आहिस्ता–आहिस्ता अपना सर घुडसवारों की ओर घुमाया जहां एक और चौंकाने वाला दृष्य उसकी प्रतीक्षा में था. 

परमा ने देखा तो देखता ही रह गया. उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मिरागाबीर की किशोरी बेटी पूनों साक्षात, उसके घर के प्रवेशद्वार पर आ पहुंची थी. पूनों पांच घुड़सवार लड़ाकों के बाहरी सुरक्षा वृत्त के बीच तीन अश्वारोही अंगरक्षकों के अंदरूनी घेरे से, धूल के सघन गुबार को पार करती हुई, आहिस्ता-आहिस्ता अवतरित हो रही थी. उसकी लंबी छरहरी काया और लंबे घने केश का आकार धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा था. 

उस क्षण से पहले तक परमा ने कबीले के सरदार की बेटी पूनों का केवल नाम और उसके सौंदर्य की प्रसंशा ही सुनी थी परन्तु कभी देखा नहीं था क्योंकि  मिरगा बीर की पत्नी नैना और बेटी पूनों सरदार की बाखर से कभी बाहर नहीं निकला करती थीं. सरदार की बाखर करियाटेकरी पहाड़ी से लेकर बुदनी नदी तक एक विशाल दायरे में फैली हुई थी और बाखर की दौनों महिलाओं को किसी भी प्रयोजन से आहाते के बाहर निकलने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी. 

बाखर के चारों ओर दो-पुरुष ऊंची मज़बूत चारदीवारी पत्थरों की खडी सिल्लियों को आपस में जोड़ कर तामीर की गई थी. केवल कबीले की महिलाओं और किशोरियों को ही बाखर में प्रवेश की इजाज़त थी. पुरुषों में केवल परमा के पिता कोदू सहित कबीले के प्रमुख लड़ाके और मिरागाबीर के अंगरक्षक ही बाखर में सरदार के बुलावे पर प्रवेश कर सकते थे. इन प्रतिबंधों के फलस्वरूप परमा सहित कबीले के अन्य किसी पुरुष ने आज तक पूनों की झलक तक नहीं देखी थी.  

आज जब पूनों परमा के घर के प्रवेश द्वार पर स्वयं ही आ पहुंची तो परमा अपने होशोहवास खो बैठा. उसका मुंह खुला, तो खुला का खुला ही रह गया. करीब दो बांस की दूरी से पूनों जैसे-जैसे उसके निकट आती जा रही थी, वैसे-वैसे उसकी आकृति और रूप स्पष्ट होते जारहे थे. परमा को लग रहा था जैसे पूनों हवा में तैरती हुई आगे बढ़ी आ रही थी. हर कदम के साथ उसके लंबे छरहरे पैर, जैसे किसी जलधारा को काटते हुए, आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ रहे थे. सीप जैसे उजले रंग की पिंडलियों पर लाल रंग के चमड़े की पट्टी कसी हुई थीं और उज्जवल कोमल पंजों की पतली-पतली उँगलियों पर गुलाबी नाखून ऐसे सज रहे थे जैसे हाथीदांत के आभूषणों पर रत्न जड़े हुए हों. 

कमर से लेकर घुटनों के नीचे तक पूनों ने सुनहरे लाल रंग की सूती धोती कांच लगा कर बांधी हुई थी. पूनों की कमर कबीले की सामान्य नारियों से अधिक पतली थी जिसपर बंधी हुई धोती के ऊपर लाल चमड़े का कमरपट्टा कसा हुआ था, जो हर कदम पर डोलता जा रहा था. पूनों के कमरपट्टे की दाहिनी ओर एक दोधारी तलवार लटक रही थी और बाईं ओर एक कटार खोंसी हुई थी. शरीर के ऊपरी धड़ पर सुनहरा लाल मुलायम सूती-कपड़ा, गले से लेकर वक्ष को ढंकता हुआ और कन्धों के नीचे से होता हुआ कमर से कुछ ऊपर, बड़ी सी सरफून्द की शक्ल में, बंधा हुआ था. सरफून्द से बाहर लटके हुए अंगिया के कपड़े के लंबे छोर हवा में लहरा रहे थे. 

पूनों के सुनहरे, घने और लंबे बाल, सर से लेकर कमर के नीचे तक बिखरे हुए, उसकी काया को एक मनमोहक छवि प्रदान कर रहे थे. कबीले की अन्य किशोरियों और महिलाओं से भिन्न पूनों के बालों को माथे पर कसे हुए चमड़े के पट्टे से सीमित दायरे में नही बांधा गया था. उसके सुन्दर सुनहरे केश उन्मुक्त रूप से चेहरे के आस-पास एक बड़े दायरे में बादलों की तरह घिर आए थे और हर कदम के साथ लहराते जा रहे थे. 

पूनों का चेहरा सुनहरे बालों में, बदली के चाँद जैसा दक-दक दमक रहा था. सीप सा उजला रंग, सुतवां नाक, हिरनी जैसी बड़ी-बड़ी  नीली आँखें और भवों को छूती हुई लंबी-लंबी घनी बिरोनियाँ किसी को भी मुग्ध करने की क्षमता रखती थीं.

परमा अपना मुंह खोले हुए, दौनों हाथ नीचे लटकाए और पत्थर की शिला सा निश्चल खड़ा हुआ एकटक पूनों की ओर टकटकी लगाए देखे जा रहा था; ऐसा, जैसे कि कोई दिवा स्वप्न देख रहा हो. लेकिन उसका मनभावन सपना शीघ्र ही टूटकर बिखर गया जब उसके कानों में उसकी माँ नौनी की आवाज़ सुनाई पडी-
“अरी पुनिया... आज कैसे बखरी के बाहर निकर आई री...”

परमा ने होश में आकार अपने सर को जोर का झटका दिया. उसने घर के आहाते के भीतरी तरफ  सर घुमा कर देखा तो पाया कि उसकी माँ पूनों की ओर भागती आरही थी. उधर पूनों भी नौनी को आवाज़ देती हुई उसकी ओर तेज़ी से भागती जा रही थी- 
“अरी नौनी काकी...! देख...! मैं तो आ गई तोरे बाड़े में... तन्नक बता तो, बो हिरन को बच्छा कहाँ है... अरी काकी, मैं ओई हे देखबे तो आई हों...”

"पूनों 
घायल मृग शावक को देखने आई थी"... यह जानकार परमा का काल्पनिक स्वप्नलोक एकाएक चूर-चूर हो गया. उसे यह भी संदेह होने लगा कि संभवतः सरदार मिरागा बीर ने ही उसे घायल मृग पर चल रहे उपचार का मूल्यांकन करने का प्रशासनिक कार्य सौंपा होगा. परमा को इस बात का गंभीर आघात भी लगा कि पूनों ने पहली मुलाक़ात पर ही उसकी पूर्ण उपेक्षा कर दी और उसकी ओर देखा तक नहीं. 

संभावित उपेक्षा की आशंका से उसका मन क्षोभ से भर गया. उसने अपना धनुष उठाया और अड़िया हटा कर घर के आहाते से बाहर निकल गया. प्रवेशद्वार के बाहर पूनों के घुड़सवार अंगरक्षक अड़िया को घेरे चौकन्ने खड़े हुए थे. परमा को आता देख उन्हींने उसे सुरक्षित रास्ता दे दिया. सुरक्षा घेरे के बाहर आकार परमा ने बुदनी नदी की दिशा में घाट के ढाल की ओर देखा और भूरा की तलाश में आगे बढ़ गया. 

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... शेष अगले अंक में क्रमशः
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Synonims: अंगिया- blouse; बाड़े / बाड़ा= आहाता, compound;  अड़िया= crude gate made of a wood log placed horizontally on two supports; खदेड़= drive away; माँसपेशियाँ= muscles; खरौंच= scratch; प्रत्यंचा= bow string; कुल्हाड़ी= axe; मूठ= long wooden handle; घुटनों= knees; हूबहू= identical; मृगछौने= calf of a deer; अड़ियों= crude wooden gate; प्रयोजन= purpose; गतिविधियाँ= activities; तमाशा= stunt; किशोरावस्था= adolescence; झुंडों= herd; सरफूंद= french knot; अंगोछे= scarf; हँसिया= sickle; बिरौनियों= eye leshes; बयार= breeze; मलगा= wooden log; झिरिया= cascade; अंजुली= handful; डकार= burp; शल्यक्रिया= surgery; जड़ी-बूटियों= hurbs; अपराधबोध= guilt; बाड़ों= गाय-बकरी fence; मलगा= wood log; कल्ला= मिट्टी का तवा, terracotta griddle, terracotta hotplate; मूड़= सर, head; अलाव= bonfire; खूटों= baton; मूड़= head; नियंत्रण= Control; सूरज= the sun; आँच= heat; शिकायत= complaint; शिकार= prey, hunt; बाखर= sprawling royal residential complex; 
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Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
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अगला एपीसोड शीघ्र ही आ रहा है...
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१९ नवम्बर २०१२

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