Harish Jharia

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24 March 2010

How to protect looking glasses from damages…

Crazy Ideas: 


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Suspend them on hooks...

How to protect looking glasses from damages…

It is a common problem for people to take care of their spectacles while not in use. We use to keep our glasses on table, on TV, on the sill of a fireplace or even we toss them on anything whatever.

This practice results in damaged optical surfaces of the lenses due to rubbing marks, scratches, pits and chippings. We do not have time, sensitivity and patience to put the pairs of glasses in their carrying-cases while at home.   

It is a good idea to attach tiny hooks on your work places and bedrooms right within your easy reach. You may hang your spectacles / looking glasses / goggles on these hooks and keep them safe from potential damage.

Just try this Idea and post your comment right here…

- Harish Jharia
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npad

12 March 2010

eNovel: Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone) : Episode- 5

Patthar ki Ibaarat cropped

Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2010 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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उपन्यास: पत्थर की इबारत, एपीसोड- 5 

© Harish Jharia

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ…

… परमा और कुछ अन्य नवयुवक घायल हिरन के बछड़े की देखभाल में लगे हुए थे और कबीले के आम लोग बार-बार पीछे मुड़-मुड़ कर देख रहे थे और सरदार के आने पर होनेवाली कार्यवाहियों का अंदाज़ा लगा रहे थे। उनके मन में उत्सुकता, आशंका और भय के मिले-जुले भाव तैर रहे थे। कोई नहीं जानता था कि हिरन के बछड़े को घायल करने की गलती किससे हुई होगी और इस जघन्य अपराध की उसे क्या सज़ा दी जाने वाली थी…

और आगे…

लड़ाकों के द्वारा पाठलों और कुल्हाड़ियों से जंगल की झाड़ियों को तहस-नहस करने की आवाज़ें आ रही थीं। साथ ही लड़ाके अपनी पूरी शक्ति लगाकर ऊंची आवाज़ों में अपराधी को ललकार रहे थे:
अरे कौन है रे… बाहर आ जा नईं तो आउत है सरदार्… सरदार आउत है रे…! बाहर निकर आ आ आ…!

कबीले के स्त्री-पुरुष भयभीत स्थिति में उस कर्णभेदी शोर और चीत्कार के बीच एक-दूसरे से चिपके हुए खड़े हुए थे। बच्चे अपने-अपने घरों या साथियों के घरों में, जहां जगह मिली वहीं जा छुपे थे। उन्हें झांक कर भी घटनास्थल की ओर देखना सख्त मना था।

बुदनी नदी के किनारे का वह इलाका रिहायशी क्षेत्र के नज़दीक होने के बावजूद निर्जन था। ऊंचे–ऊंचे सघन वृक्षों के बीच घनी कटीली झाड़ियों में ज़हरीले सांप, बिच्छू और गुहेरे विचरण करते रहते थे। बुदनी के मगरमच्छ भी अपने भोजन की तलाश में इसी निर्जन स्थान में आते रहते थे क्योंकि भटके हुए हिरन के शावक अक्सर इसी जगह के चक्रव्यूह में आ फ़ंसते थे और एक बार भटक जाने के बाद, फिर वहां से बाहर नहीं निकल पाते थे।

ऐसे सुनसान और निर्जन स्थान का वातावरण एकाएक सैकड़ों लोगों की भीड़ और डरावने चीत्कार से भर गया और वहां का दृष्य हरी-भरी कटीली झाड़ियों के तहस-नहस होने के बाद खुले उजाड़ मैदान में तब्दील हो गया। झुरमुट के भीतर जहाँ पहले पाँच-दस हाथ से आगे का कुछ भी नही नज़र आया करता था वहाँ से बुदनी का पानी, उसका, चौड़ा पाट और उसके दूसरे पार का जंगल साफ़ नज़र आने लगा था। उजड़े झुरमुट मे खड़े असहाय कबीले के लोग अपने-आप को लुटा हुआ सा महसूस कर रहे थे।

कबीले में जहां एक ओर लोगों का भोजन बिना हिरन के माँस के पूरा नहीं होता था वहीं दूसरी ओर हिरन और अन्य वन्य प्राणियों की सुरक्षा के प्रति भी कबीले की जागरूकता अविश्वसनीय थी। हिरन के शावक पर आक्रमण की घटना से पूरा कबीला स्तब्ध रह गया था। साथ ही एक मूक प्राणी पर क्रूरता करने का नतीजा भुगतने वाले व्यक्ति के लिए भी लोगों में तरह-तरह की आशंकाएं पैदा हो रही थीं।

कबीले का हर व्यक्ति जानता था कि अपराधी को कम से कम इतनी सज़ा तो मिलनी तय है कि उसे नंगा करके चमड़े के पट्टे से अधमरा होने तक पीटा जाय्। किन्हीं अन्य परिस्तिथियों में ऐसे जघन्य अपराध के लिए अपराधी का अंग-भंग भी किया जा सकता था जो पूरे कबीले के लोगों की उपस्तिथि मे अत्यंत क्रूरतापूर्ण ढंग से करने की परंपरा थी। 

सरदार यदि चाहता या कबीले के लोगों के द्वारा सामूहिक रूप से माँग रखी जाती तो सर्व-सम्मति से अपराधी को अंग-भंग की सज़ा देने के लिए पंचायत भी बुलाई जा सकती थी। इस सार्वजनिक अदालत बिठाने के लिए कबीले के बड़े बुज़ुर्ग सरदार की बखरी में एक विशाल बरगद के नीचे कबीले के लोगों को इकट्ठा कर अपराधी पर बाकायदा मुकदमा चलाते थे।

कबीले की इस सर्वोच्च अदालत में सामाजिक बहिष्कार, देश-निकाला, अंग-भंग और मृत्यु दण्ड जैसी गंभीर सजाओं का ऐलान किया जाता था और सख्ती से लागू किया जाता था। ऐसे सभी फ़ैसले कबीले के सभी निवासियों को स्वीकार्य हुआ करते थे। कबीले की पंचायत में लिए जाने वाले निर्णयों को किसी सीमा तक सरदार भी प्रभावित किया करता था क्योंकि सरपंच के आसन पर वही बैठता था। परंतु वह पंचायत की कार्यवाही और निर्णयों को एक सीमित परिमाण में ही प्रभावित कर पाता था और उसके लिए इस उच्च स्तरीय अदालत में अपनी मनमानी करने की संभावना नहीं होती थी।   

सभी को कबीले के सरदार ‘मिरगा बीर’ के आने की प्रतीक्षा थी जिसे घटनास्थल पर ही अपराधी की पिटाई करने का अधिकार था। उसका शरीर दानव सा विशाल, लंबा चौड़ा और हाथी जैसा शक्तिशाली था। वह चीते के जैसा चुस्त, चतुर और फ़ुर्तीला था। उसने पलक झपकते ही पेड़ों पर चढ़ जाने और एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर झूलते हुए पूरे जंगल भर में विचरण करने में महारथ हासिल कर ली थी। मिरगा बीर अंतहीन दमखम का मालिक था जिसमें अनवरत काम करने, आखेट में जूझते रहने और युद्ध या युध्याभ्यास करते रहने की क्षमता थी। कबीले में वही एक ऐसा लड़ाका था जो कई बार निहत्थे ही आक्रमक जंगली जानवरों से लड़कर उन्हें परास्त कर चुका था।

मिरगा बीर कबीले के लिए जंगली गायों, भैंसों और सांडों को पालतू बनाने की प्रक्रिया में उन्हें अकेले ही सींगों से पकड़ उनकी गर्दनों को अपनी भारी-भरकम पुष्ट भुजाओं में जकड़ कर फ़ड़फ़ड़ाने पर मजबूर कर दिया करता था। कबीले मे दूध निकालने और खेती के काम के लिए पाले गए लगभग सभी गायों, भैंसों और सांडों जैसे मवेशियों को पालतू बनाने में मिरगा बीर का सक्रिय प्रयास हुआ करता था।

उसकी शक्ति, सामर्थ्य, बुद्धिमानी और मानवीयता ने उसे उस ज़माने का प्रख्यात योद्धा और प्रशासक बना दिया था जिसकी प्रसिद्धि आसपास के सैकड़ों कबीलों और आठ कोस दूर बसे हुए एक विशाल राज्य ‘पाटन’ तक फ़ैली हुई थी। यह मिरगा बीर का प्रख्यात व्यक्तित्व ही था जिसके चलते उस इलाके के सबसे विकसित राज्य पाटन के शक्तिशाली राजा ‘राव सुमेर जू’ उसे सभी राजकीय समारोहों मे आमत्रित किया करते थे। यह मिरगा बीर का दबंग व्यक्तित्व ही था जिसके कारण पाटन राज्य से मिरगा बीर के कबीले को अनाज, नमक, तेल, मसाले, सूती कपड़े, धातु के बरतन, और अस्त्र-शस्त्र की आपूर्ति हुआ करती थी। पाटन राज्य और कबीले के समझौतों के तहत कबीले की ओर से हरड़, बहेड़ा, आँवला, महुआ, लाख, कत्त्था, जलाउ लकड़ी, इमारती लकड़ी और बांस जैसे प्राकृतिक उत्पाद पाटन राज्य को भेजे जाते थे।

हाल ही में पाटन राज्य पर हुए एक विदेशी आक्रमण के दौरान हुए भीषण युद्ध में मिरगा बीर ने अभूतपूर्व वीरता और महा-विनाशक युद्धकौशल का परिचय देते हुए राव सुमेर जू को विजय दिलवाने में अपने लड़ाको की सैना के साथ सर्वाधिक योगदान दिया था। उसी के बदले में सुमेर जू ने मिरगा बीर को बारह कद्दावर घोड़े पुरस्कार स्वरूप भेजे थे। मिरगा बीर ने उन में से छः घोड़े अपने इस्तेमाल के लिए रख लिए थे और बाकी छः घोड़ों पर सवार होकर उसके अंग रक्षक दौनों ओर तीन-तीन की पंतियाँ बनाकर उसके साथ-साथ चला करते थे।

मृग शावक के गहरे घाव की पीड़ा में जड़ी-बूटियों से आराम लग चुका था और वह एक आँवले के वृक्ष के नीचे निश्चल पड़ा हुआ था। परमा ने उसके आगे और पीछे के पैर अलग-अलग मुलायम और मज़बूत लताओं से बाँध रखे थे। परमा हिरन की गरदन को सहलाकर उसे अधिक से अधिक परिच्रर्या और आराम देने की कोशिश कर रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे हिरन सो गया हो। तभी एकाएक कई घोड़ों के टापों की आवाज़ से पूरा  वातवरण गूँजने लगा। हिरन के शरीर में कुछ हरकत हुई और परमा उसे छोड़कर एक झटके के साथ उठकर खड़ा हो गया। सभी लड़ाके घटनास्थल पर घायल मृग और नज़दीक के वृक्षों को घेर कर चाक-चौबंद तैनात हो गए। परमा के अतिरिक्त सभी कबीला-वासी लड़ाकों की पंतियों के पीछे दुबककर खड़े हो गए।  

सात घोड़ों की टापों की धमक से लोगों को ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे धरती में कंपन हो रहा हो। पूरा वातावराण धूल के गुबार से भर गया था और उसी गुबार के बीच से मिरगा बीर एक काले घोड़े पर सवार तूफ़ान की गति से बाहर आया और एक झट्के से उसने घोड़े को लोगों के बीचों-बीच रोक दिया। घोड़ा चार-पाँच कदम की दूरी तक पैर घिसटाता हुआ रुक गया और रुकते ही पिछले पैरों पर खड़े होकर उसने आगे के दौनों पैर ऊपर हवा में उछाले और ज़ोर से हिनहिनाने लगा। तभी उसके अंगरक्षक भी आकर उसके पीछे घोड़ों को रोककर चारों ओर चहल कदमी करने लगे और बाज जैसी नज़रों से आँखें फ़ाड़-फ़ाड़ कर चारों तरफ़ का मुआयना करने लगे।

कबीले के लगभग पाँच सौ लोगों की भीड़ स्तब्ध होकर सन्नाटे में खड़ी काँप रही थी। वे पहले ही कबीले के लड़ाकों से घिरे हुए थे ऊपर से मिरगा बीर के आने के बाद तो छः आक्रामक छवि वाले अंग रक्षकों ने उनपर भारी-भरकम कमानों से महाविनाशक तीर तान रखे थे जो किसी भी आदमी के धड़ को आर-पार भेद सकते थे।

मिरगा बीर के चेहरे पर सदा की भाँति शांत भाव छाया हुआ था। परंतु उसका शरीर बेचैनी और कबीले में घटी दुर्घट्ना के प्रति अपराधबोध के कारण निरंतर अस्थिर हो रहा था। उसकी भारी भरकम भुजाओं की मछलियों मे थिरकन हो रही थी, वह बाएँ हाथ से लगाम को दाहिने-बाएँ झटक कर घोड़े को लगातार अपने आस-पास की खाली ज़मीन पर घुमाता जा रहा था और उसके दाहिने हाथ में लंबी दुधारी तलवार लहरा रही थी। भीड़ के बीच दुबकी हुई नारियों के आतंकित चेहरों पर भय का भाव फ़ैला हुआ था और डबडबाई हुई आँखों से वे सात विशालकाय घुड़सवारों की भयावह शक्ति का ताण्डव अपनी आँखों के कोरों से ताक रही थीं। वहीं दूसरी ओर कबीले के पुरुषों के चेहरे मिरगा बीर की शक्ति का अंदाज़ा लगाकर गर्व से दमक रहे थे और उनका सीना शान से चौड़ा हो गया था।

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शेष अगले अंक में क्रमशः
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Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
Opening Page:  Preface:  Introduction:  Episode-1:  Episode-2:  Episode-3:  Episode-4:  Episode-5:  Episode-6:  Episode-7:  Episode-8:  Episode-9: Episode-10: : Episode-11: Episode-12: Episode-13; Episode-14     
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Synonyms of Hindi words: 
बखरी= big rural house with boundary-wall ; अंग-भंग= cutting off limbs; बछड़े= calf; उत्सुकता= curiosity ; आशंका= suspicion; भय= fear; पाठलों= heavy cutting tool; जघन्य अपराध= serious crime; कर्णभेदी= jarring; ज़हरीले= venomous; सांप= snake; बिच्छू= scorpion; मगरमच्छ= crocodile; लड़ाके= fighters; बरगद=  banyan tree; घिसटाता= ; dragging; अंगरक्षक= body-guards;कबीले= tribal clan; सन्नाटे= silence; आक्रामक= aggressive; दुर्घट्ना= mishap; ताण्डव= lord Shiva’s dance of death; डबडबाई= tearful eyes; घुड़सवारों= horse riders; लहरा= brandishing; आतंकित= terrorized; भीड़= crowd; दुधारी= double edged; कमानों= bows
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Caution: 
This creative work has been originally written by the author Harish Jharia who is the sole owner of the text and this intellectual property. This has been published on the personal Blog “Discover Life” of Harish Jharia at the URL: http://harishjhariasblog.blogspot.com/. No hyper-link to this novel “Patthar ki Ibaarat” (Script of Stone) has been provided nor any permission granted to any person, organization or site whomsoever, by the writer and owner of the copyright of this novel that is Harish Jharia. This novel has been published on the blog “Discover Life” for the visitors to this blog for their healthy reading and intellectual entertainment. The novel in whole, in part or as extracts should not be copied and or reproduced neither on internet, nor written on CDs nor printed on books, magazines newspapers and or in any media. - Harish Jharia
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Disclaimer: 
This is a work of fiction and all the characters, story, incidents, culture, social life, evolution, developments etc are all imaginary.  This article / Story / fiction is written based on my personal observations and imagination. My intention for publishing the same is to provide healthy reading and intellectual entertainment and not for educating the visitors. Names of people, societies, communities and description of faiths, beliefs, incidents are imaginary and fictitious. They have neither any relevance to the prevailing entities and traditions nor have any similarities with ongoing lifestyles, political ideologies and legal doctrines. The contents of this creative work have not been written with any intention to criticize, condemn or oppose anything what-so-ever present in reality in any country in the world. No literature or authentic books have been referred for writing the contents of this article. The visitors are advised not to refer the contents of this article for any research or testimony on scientific, geographical, political, civic, social or legal purposes. The visitors are further advised to consult relevant experts before adapting any information from this article. The author or the website are not responsible for any errors, mistakes, or omissions there in.
- Harish Jharia
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How to Remove Oil Spilled Over Our Clothes…

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How to Remove Oil Spilled Over Our Clothes…
It becomes a big embarrassing problem when we spill oil on our clothes, for the simple reason that oil stains cannot be removed by normal cleaning in washing machines.
Now here is a way to remove oil from your clothes… all by yourself.  Here is the way-out that can be done right at home:
  1. Take your ironing plank / table
  2. Spread a tissue paper on it
  3. Sprinkle talcum powder on the tissue paper
  4. Spread the oil stained cloth on the talcum powder evenly stretched
  5. Sprinkle talcum powder on the oil stained portion of cloth
  6. Spread another tissue paper on the talcum powder
  7. Now… move a moderately hot iron on the tissue paper for 2 minutes
  8. Repeat this drill with fresh sets of tissues and talcum powder for 3 to 5 times until the oil-stain vanishes and you are done.
-Harish Jharia
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08 March 2010

Double-cross policy is not safe for you…





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Double-cross policy is not safe for you…

Double-cross is a policy of betrayal when someone befriends with two individuals, provoke each of them and create rift for his own benefit or even for quenching his evil desires.

Double-cross policy of betrayal is not safe for us because the people whom we betray might someday become friends and then our evil deeds will be uncovered and eventually we will be ignored and discriminated in the society.
-Harish Jharia



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03 March 2010

Crazy Ideas: Glaucoma patients... Beware of Yoga:

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Glaucoma patients: Beware of Yoga...

In yoga there is an aasana ‘sheershaasan’ (head stand). It is believed that doing this yoga exercise at 50+ age, might affect adversely on your eye pressure (intraocular pressure).

If the intraocular pressure shoots-up beyond permissible limits you might get Glaucoma that can lead to blindness. Because high eye-pressure will damage the optic nerve and will end up in a blind eye.

People at the age of 50 and above are advised to be careful about their eyes and get their eye-test done on regular basis.

Please browse the following sites to know more about Glaucoma:
http://www.stlukeseye.com/Conditions/Glaucoma.asp
http://www.djo.harvard.edu/site.php?url=/patients/pi/415

-Harish Jharia

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