Harish Jharia

Translate this article in your own language...

Search This Blog

30 July 2010

Public Park Goes Commercial in Ghaziabad, India

- Harish Jharia 

Ghaziabad Development Authority (GDA) has made an extremely beautiful huge public park called Swarna Jayanti Park, at Neeti Khand, Indirapuram, Ghaziabad. It is constructed on a 25 acre public land the cost of which might be more than 10 crores Indian Rupees. GDA might have spent another about 25 crores plus on development, construction, installation of status and plantation of plants and trees in the park out of the tax payer’s public money.


Swarna Jyanti Park
                Main Entrance, Swarna Jayanti Park


Swarna Jayanti Park is a central place for man, women and children for spending leisure time for getting relaxation and to forget the worries of the struggling hard life that they live in the national capital of India. This place is mainly used by senior citizens for taking morning walks, evening walks and meeting other old age friends to forget the solitary lives that they are forced to live in the dusk of their lives. 


Rani Jhansi Statue
        Rani Jhansi Statue, Swarna Jayanti Park


GDA Imposes Entry Fee:
A few months back the people of this place were shocked to learn that GDA has imposed entry-fee on the people who were the sole owners of this park being a public property. 


GDA Imposes Parking Fee:
After another couple of months GDA slapped additional taxation on the people by barricading all the dozen odd parking lots constructed all around the 25 acre park.  In addition, they have handed over these parking lots to private parking contractors who are charging parking fees from the people who come to visit this park.  


GDA and UP Government are well aware that Swarna Jayanti Park is already earning revenues from the Ghaziabad Hat situated right inside the park. In addition, the government is collecting many other taxes from the residents.  The GDA and UP government have many other funds and budget provisions for providing parks and playgrounds for the people of those respective areas.  


As such both of these government bodies need not go for imposing additional financial burden on the people who are the taxpayers; out of the financial contributions of whom, Swarn Jayanti Park has been constructed. 


In view of the above, GDA and UP Government may issue orders to lift all the restrictions, including the entry fees and parking fees, imposed by the concerned authorities on the people for visiting the public park

-------------------------
npad

27 July 2010

eNovel: Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone) : Episode- 7

Patthar kii Ibaarat (Smallest)

Exclusively written for “Discover Life”
----------------------------------------------------------------
Copyright © 2010 [Harish Jharia] All Rights Reserved
----------------------------------------------------------------

© Harish Jharia

उपन्यास: पत्थर की इबारत एपीसोड- 7

… मिरगा बीर ने सर उठाकर देखा कि आँवले के वृक्ष का पाँच पुरुष ऊंचा तना बिलकुल सपाट था जिसपर चढ़ना तो किसी तरह संभव था पर उतरना नामुमकिन था। लंबे चिकने तने के ऊपर घनी डालें निकली हुई थीं जिनके पत्तों में भूरा छुपा हुआ था। उसने तसल्ली के भाव में सर हिलाया और अपने धनुष को बाँए हाथ से ऊपर उठाकर उसकी प्रत्यंचा को दाहिने हाथ की चारों उंगलियों के छोरों में अटकाकर कान तक खींच लिया। वह कुछ देर उसी स्थिति मे रुका रहा फ़िर उसने ताँत की प्रत्यंचा को झटके से छोड़ दिया। ड़ोरी के छूटते ही कानों को चीरने वाली टंकार की साँय-साँय आवाज़ निकली जिसने वहाँ मौजूद सभी लोगों को रोमांचित कर दिया। वृक्षों पर बैठे पक्षियों के झुंड के झुंड आतंकित हो आकाश में उड़ाने भरने लगे और आस-पास झाड़ियों में छुपे छोटे-छोटे जानवर जहां जगह मिली उसी ओर भागने लगे। ताँत की डोर में कुछ क्षणों तक टंकार की तीखी आवाज़ के साथ-साथ भयानक कंपन होता रहा जो धीरे-धीरे थमता गया और फ़िर चारों ओर पहले जैसी निस्तब्धता फ़ैल गई। 

और आगे…

धनुष की कर्णभेदी टंकार थमने के साथ ही मिरगा बीर झटके के साथ पीछे की ओर पलटा। उसने देखा कि उसके ठीक पीछे परमा अपने पिता का भारी धनुष बाँए हाथ में मज़बूती से पकड़े हल्ला-गोंईं की आक्रामक मुद्रा में चुस्त-चौबंद खड़ा है। मिरगा बीर ने हमेशा से ही अपने हल्ला-गोंईं के बतौर कोदू की ही अपेक्षा रखी थी। क्योंकि इतनी गंभीर जिम्मेवारी वाला काम हमेशा ही दल के सबसे फ़ुर्तीले, चतुर और युद्धकला मे पारंगत योद्धा को दिया जाता था। उसके तीन मुख्य कर्तव्य हुआ करते थे। पहला दुश्मन के वार से मुख्य योद्धा की रक्षा करना और दूसरा वार होने से पहले ही दुश्मन को आहत या धराशायी कर देना और तीसरा मुख्य योद्धा के शिकार पर निशाना साधकर रखना और उसका निशाना चूकने की स्तिथि में शिकार पर वार करना। 

मिरगा बीर इस गुत्थी को सुलझा ही रहा था कि आँवले के वृक्ष के शीर्ष से भूरा की चीखने की आवाज़ आई। मिरगा बीर बिजली की गति से उस ओर पलटा। उसने देखा कि धनुष की टंकार ने भूरा को विचलित कर दिया था और वह फ़िसल कर आँवले की एक डाल से लटक कर झूल रहा था। मिरगा बीर ने अपना धनुष फ़िर बाँए हाथ में मज़बूती से पकड़ा, उसपर ठोस बाँस का वज़नदार और लोहे की लंबी नोक वाला तीर रखा और तीर के पिछले छोर को प्रत्यंचा पर बीचों-बीच सटा कर तर्जनी और मध्यमा उंगलियों में दबा लिया। फ़िर चारों उंगलियों के पोरों में प्रत्यंचा को फ़साकर कानों तक खींच लिया। 

मिरगा बीर ने पूरी लंबाई मे आगे की ओर तने हुए हाथ को अपने ऊपरी धड़ समेत दाहिने-बाँए और ऊपर-नीचे घुमाते हुए भूरा की ओर निशाना साधा और तीर छोड़ दिया। साँय की कर्णभेदी आवाज़ के साथ तीर छूटा और दिखाई देने से पहले ही भूरा के लटकते पैरों के ठीक नीचे जाकर चार अंगुल भीतर तक आँवले के तने में धँस गया। तने मे तीर के गहरे घुसने और कठोर आघात से तेज आवाज़ हुई और ठोस बाँस के तीर में काफ़ी देर तक कंपन होता रहा। 

भूरा के झूलते हुए पैरों मे जैसे ही बाँस के भारी और मज़बूत तीर का स्पर्ष हुआ उसने टटोल कर अपने पैरों को तीर पर जमा लिया और उसपर खड़ा हो गया। उसने हाथों से ऊपर डाल को मज़बूती से पकड़े हुए नीचे झुक कर देखा तो मिरगा बीर को अपनी ओर तीखी नज़रों से देखता हुआ पाकर भय के मारे काँपने लगा। 

मिरगा बीर के चारों ओर खड़े कबीले के लोगों के मुँह से चीखें निकलते-निकलते रह गईं और उसके स्थान पर उनके चेहरे पर प्रसन्नतापूर्ण मुस्कुराहटें बिखर गईं। भीड़ में एकाएक हल्की सी हलचल हुई और लोग विस्मयपूर्ण दृष्टि से एक दूसरे की ओर देखने लगे। वहाँ उपस्तिथ बरगी कबीले के हर निवासी के मन में मिरगा बीर के तीर के आघात से भूरा की जीवन लीला समाप्त होने का लगातार संदेह बना हुआ था। परंतु जब मिरगा बीर ने भूरा को स्वर्ग पहुँचाने के बजाय जीवन धारा मे वापस आने के लिए अपने बाँण की सीढी प्रदान करदी तो भीड़ मे प्रसन्न्ता की लहर दौड़ गई।

मिरगा बीर के चेहरे पर संतोष का भाव पैदा हुआ। उसने अपने होठों को भींचा और तीर निशाने पर लगने के बाद पहली बार अपनी आँखों को झपकाया। उसने अपनी नज़रें भूरा से हटाईं और विशाल धनुष सहित बायां हाथ नीचे झुला दिया। फ़िर वह एकाएक पीछे की ओर मुड़ा और एकबार फिर अपने नए हल्ला-गोंईं परमा पर नज़रें गड़ा कर एक निःश्वास छोड़ी। 

परमा धनुष पर बाँस का भारी तीर चढाए भूरा पर निशाना साधे वार करने के लिए आक्रामक मुद्रा में तैयार खड़ा था। एकाएक मिरगा बीर के पलटकर ठीक उसके सामने खड़े हो जाने से परमा सहम सा गया। उसने तो भूरा पर निशाना साध रखा था कि अगर मिरगा बीर का वार खाली जाता तो वह भूरा पर अपना तीर छोड़ देता और जब मिरगा बीर का तीर पेड़ के तने मे जा धँसा तब भी परमा अपना तीर छोड़ने वाला था। वह एक पल के लिए समंजस में पड़गया कि इतने नज़दीक से मिरगा बीर का निशाना कैसे चूक सकता था और इसी अंतराल में मिरगा बीर ने उसे गलती करने से बचा लिया। 

मिरगा बीर को उसकी विशाल काया सहित अपने इतने नज़दीक खड़े हुए और ठीक अपनी आँखों में देखते हुए पाकर परमा को परम आनंद और महान उपलब्धि का अनुभव हुआ। उसने अपनी आँखें भूरा की ओर से हटाकर मिरगा बीर की तरफ़ घुमाईं। मगर जैसे जैसे उसकी नज़रें मिरगा बीर की तरफ़ घूमती गईं वैसे-वैसे आँखें उसके पैरोँ की ओर झुकती गईं। उसने पीछे फ़ैले अपने दाहिने पैर को आगे खींचा और सीधा खड़ा हो गया। उसने अपने बाएँ हाथ में मज़बूती से पकड़े हुए भारी धनुष और दाहिने हाथ मे थामे हुए ठोस बाँस के तीर सहित दौनों हाथ नीचे कि ओर लटका लिए। चारों ओर एकाएक निस्तब्धता छा गई। परमा ने धीरे धीरे सर उठाकर मिरगा बीर की ओर देखने का प्रयास किया कि तभी उसे अपने दौनों कंधों पर मिरगा बीर के मजबूत और कठोर हाथों का स्पर्ष अनुभव हुआ।

मिरगा बीर ने अपने दौनों हाथों से परमा के कंधों को पकड़कर हल्के से हिलाया और अपनी गहरी आवाज़ में कहा- 
फुर्ती तो बहुत है तो में… चल अब अपनो निसाना बी दिखा दे… 

इतना कहकर मिरगा बीर एक पल के लिए रुका; दुबारा निशाने की ओर पलटा और फ़िर भूरा की ओर उँगली दिखाते हुए बोला-
भूरा हे नीचें उतरबे के लाने पेढ़े पै छिड़िएँ बनानें हैं…  ओके लाने चार जबर तीर पेढ़े में धाँसने हैं… बीच में एक तीर मैं चूकहों… तभइ तोहे वार करने है… 
तैयार है…? चल हल्ला बोल्…

कहकर मिरगा बीर क्षण भर में पुनः अपनी पहले वाली आक्रामक मुद्रा में धनुष की प्रत्यन्चा कानों तक खींचकर तैयार हो गया। उसने एक–के-बाद-एक तीन तीर वृक्ष के तने में तीन-तीन हाथ दूर एक के नीचे एक धँसा दिए। हर बार भूरा उन तीरों पर पैर रखता हुआ नीचे उतरता गया। परमा हर बार मिरगा बीर का निशाना चूकने की प्रतीक्षा में वार करने के लिए चाक-चौबंद तैयार रहा। पर हर बार मिरगा बीर तने पर सही वार करता गया। 

चौथे तीर की बारी आने पर परमा को लगा कि मिरगा बीर उसी तीर को आखिरी सीढ़ी बनाने के लिए इस्तेमाल करेगा। पर सवाल यह था कि मिरगा बीर निशाना चूक कर परमा को हल्ला-गोंई के बतौर वार करने का मौका देता भी है या नहीं। तभी मिरगा बीर की कमान से तीर साँय-साँय की आवाज़ के साथ छूटा। परमा बाज की तरह पेड़ के तने पर आँखें गड़ाए हुए, धनुष की प्रत्यन्चा को कान तक खींचे हुए और साँस रोक कर तीर छोड़ने के लिए तैयार था। उसी क्षण उसने देखा कि मिरगा बीर ने तीर निशाने से बाहर मार दिया। परमा तो इसी क्षण की ताक में था। उसने बिना एक क्षण का विलंब किए ठीक तीन हाथ नीचे चौथा तीर पेड़ के तने मे धँसा दिया। 

भूरा लगभग ज़मीन के नज़दीक उतर आया था। उसने तने पर परमा के तीर का आघात अनुभव करते ही तीर को पजों से टटोल कर ढूँढ लिया। वह अपने पैरों को तीर पर जमाकर खड़ा हुआ और जमीन पर कूद गया।  वह थर-थर काँप रहा था। उसने अपने दौनों हाथों से अपना चेहरा ढँक लिया और ज़मीन पर घुटनों में सर छुपाकर उकड़ूँ बैठ गया।  

------------------------------------------------------------------------------------
शेष अगले अंक में क्रमशः
-----------------------------------------------------------------------------------
Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
Opening Page:  Preface:  Introduction:  Episode-1:  Episode-2:  Episode-3:  Episode-4:  Episode-5:  Episode-6:  Episode-7:  Episode-8:  Episode-9: Episode-10: : Episode-11: Episode-12: Episode-13; Episode-14 
-------------------------------------------------------------------------------
Synonyms of Hindi words:
कबीले= tribal clan; सन्नाटे= silence; आक्रामक= aggressive; कमानों= bows; तलवार= sword; विशालकाय = gigantic ; आघात= strike; कंपन = vibrations; कानों को चीरने वाली= jarring; ठोस बाँस= solid bamboo; बाण= Arrow; युद्धों= wars; रोमांचित= ; वृक्षों= trees; पक्षियों के झुंड= flocks of birds; हल्ला-गोंईं= combat buddy; क्षण= moment;  निःश्वास= sigh; आनंद= pleasure; उपलब्धि= achievement; विलंब= delay; 
----------------------------------------------------------------------------------


“About the novel: Script of Stone”…

About 2500 years back there was a hamlet ‘Bargi’ in the dense forests of north-east central India settled at the banks of a huge river ‘Budni’.  This river was the lifeline for the people of Bargi as it provided the basic needs like water, fish, crabs and shrimps for their survival. In rainy season Budni used to swell with disastrous floods claiming lives and properties of these people. The people of Bargi considered these calamities as divine powers and resorted to worshiping the river as their deity.  They used to address the river as Budni maai (mother Budni). 

Many generations back, their forefathers settled on the banks of river Budni and initiated primitive ways of farming coarse grains like jawar, bajra, kodon, kutki and corn etc. They also developed systems of growing green vegetables on improvised pieces of farmland in their residential compounds. They had basic knowledge about the importance of watering plants and farmland. Yet, the major portion of their daily food consisted of meat of fish, birds, rodents and animals abundantly available in the forest.  

The people of this area had copper colored skin with very thin growth of body hair and facial hair. They had dark brown thick hair on their heads that the males trimmed to shoulder length. They had huge, rugged and muscular bodies that helped them to lead a rough and tough life. The profession of the people of this settlement was hunting and fighting for their survival. Climbing trees and hopping from one treetop to another was a part of their daily routine. It was quite risky for humans to roam around in the dense forest on the ground as there was possibility of lethal attacks by wild animals from adjoining thick bushes and rocky caves. 

People of Budni used to have iron tools like axes, daggers and swords for fighting enemies and hunting for their food. They used bows and arrows as their main weapons. Bows and arrows were made of strong, flexible and solid bamboos. They used to make arrowheads with iron for easy penetration through flash and bones of the wild animals. They also procured cane from distant forests for making arrows for hunting huge wild animals. 
------------------------------------------------------------------------- 
Caution:
This creative work has been originally written by the author Harish Jharia who is the sole owner of the text and this intellectual property. This has been published on the personal Blog “Discover Life” of Harish Jharia at the URL: http://harishjhariasblog.blogspot.com/. No hyperlink to this novel “Patthar ki Ibaarat” (Script of Stone) has been provided nor any permission granted to any person, organization or site whomsoever, by the writer and owner of the copyright of this novel that is Harish Jharia. This novel has been published on the blog “Discover Life” for the visitors to this blog for their healthy reading and intellectual entertainment. The novel in whole, in part or as extracts should not be copied and or reproduced neither on internet, nor written on CDs nor printed on books, magazines newspapers and or in any media.
- Harish Jharia
--------------------------------------------------------------------------
Disclaimer:
This is a work of fiction and all the characters, story, incidents, culture, social life, evolution, developments etc are all imaginary. This article / Story / fiction is written based on my personal observations and imagination. My intention for publishing the same is to provide healthy reading and intellectual entertainment and not for educating the visitors. Names of people, societies, communities and description of faiths, beliefs, incidents are imaginary and fictitious. They have neither any relevance to the prevailing entities and traditions nor have any similarities with ongoing lifestyles, political ideologies and legal doctrines. The contents of this creative work have not been written with any intention to criticize, condemn or oppose anything what-so-ever present in reality in any country in the world. No literature or authentic books have been referred for writing the contents of this article. The visitors are advised not to refer the contents of this article for any research or testimony on scientific, geographical, political, civic, social or legal purposes. The visitors are further advised to consult relevant experts before adapting any information from this article. The author or the website are not responsible for any errors, mistakes, or omissions there in.
- Harish Jharia
-----------------------------------------------------------------------------
npad

24 July 2010

How blood pressure should be measured?

How blood pressure should be measured?


- Harish Jharia


Recently I happened to interact with one of my relatives, incidentally a doctor. We had a discussion on hypertension that is commonly called blood pressure or BP in short.  I had a simple question that how a doctor is expected to measure BP of a person? The relative liked the question and preferred to answer in a bit detailed way:


He said that, at the time of measuring blood pressure the patient is asked to lie-down, outstretched on a flat surface extending the arms at sides of the body at the level of the heart. 


Blood pressure is then measured with a small, portable instrument called a Sphygmomanometer or blood pressure cuff. Doctors place the cuff around the upper arm of a patient and inflate the same with an air pump to a pressure until it blocks the flow of blood in the main artery.  The measurement is taken (in mm Hg units) from a scale placed along the vertical mercury column that increases and decreases on inflating or deflating the cuff. 


Photobucket


The pressure of the cuff on the arm and artery is then gradually released by the doctor. As the pressure in the cuff decreases, the doctor hears the pulsating sound-beats by placing the sensor of a stethoscope over the artery at the front of the elbow.  


At a particular pressure the flow of the blood circulation starts. The pressure at which the practitioner first hears a pulsation from the artery is called systolic pressure


As the cuff pressure further decreases, the pressure at which the pulsation finally stops is called diastolic pressure.  


Blood Pressure observed as "Systolic- 120 / Diastolic- 80", commonly expressed as 120 / 80 is considered normal in a healthy young person. 


---------------------------
Disclaimer:
This article / Story / fiction is written based on my personal observations. My intention for publishing the same is to provide healthy reading and intellectual entertainment and not for educating the visitors. Names of people, societies, communities and description of faiths, beliefs, incidents are imaginary and fictitious. They have neither any relevance to the prevailing entities and traditions nor have any similarities with ongoing lifestyles, political ideologies and legal doctrines. The contents of this creative work has not been written with any intention to criticize, condemn or oppose anything what-so-ever present in reality in any country in the world. No literature or authentic books have been referred for writing the contents of this article. The visitors are advised not to refer the contents of this article for any research or testimony on scientific, geographical, political, civic or legal purposes. The visitors are further advised to consult relevant experts before adapting any information from this article. The author or the website are not responsible for any errors, mistakes, or omissions there in.
- Harish Jharia
----------------------------
npad



12 July 2010

3-hour Rains in Delhi Resulted in 5 Hours of Traffic Jams and 11 Deaths:

Review of The News Item Published in The Times Of India: 


3-hour Rains in Delhi Resulted in 5 Hours of Traffic Jams and 11 Deaths:

Three hours of heavy rains in Delhi left 11 people dead and resulted in 5 hours of traffic jams, submerged roads with knee-deep water and traffic lights blinking. Hundreds of trees uprooted and rainwater entered right inside homes.

A sudden downpour began in central Delhi and subsequently spread towards east, south and north of the NCR. The city recorded 51.4mm rainfall and wind blowing at 82-90 kmph between 5.30pm to 8.30pm. 

Rains are natural calamities but the traffic jams and deaths of innocent citizens are not. They are the results of irresponsible attitude and carelessness of the civic authorities. Let us discuss about them in brief:

11 Deaths: 
As reported in the press these deaths have resulted out of electrocution of the victims when they came in contact with necked live electric wires left unattended on the roads by civic authorities. A couple victims died when high-tension live electric cables fell over them. All of these 11 deaths could have been avoided and the victims would not have been trapped in the deadly accidents had the civic authorities maintained the electric lines and kept them ‘safe’ for the people moving around in those public places. 


5-hour Traffic Jams:
Expect for a couple of incidents of uprooted trees and fallen branches on the roads the traffic jams that prolonged for full 5 hours in many parts of Delhi were due to stagnated water that inundated the roads above knee depth. At some places there were incidents of caving-in of roads as a result of widespread water clogging. 

This water clogging has simply resulted due to clogged drainage pipes that were laid for carrying rainwater to the main drainage system of the city. You may look at any drain ports provided at the sides of Delhi roads and you will find that they are blocked with garbage, soil and rocks. 

The civic authorities should come together and make sure that all the public utility systems are made up-to-date and subsequently maintained properly so that such stalemate can be avoided in the time to come.  

--------------------------------------------------------------------
npad