Harish Jharia

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29 January 2010

eNovel:Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone): Episode- 4

Patthar ki Ibaarat cropped

Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2010 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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उपन्यास: पत्थर की इबारत: एपीसोड- 4

© Harish Jharia

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ…

… बिन्नी हाथ में एक हरी मिर्च पकड़े परमा से टिक कर खड़ी थी और मां की प्रतीक्षा में दरवाजे की ओर देख रही थी। मां को आता देखते ही वह दौड़ कर उसके पास आई और उसके हाथ से रोटी लेकर अपने भाई के पास आ पहुँची और कलेवा उसके हाथ पर रख दिया। फ़िर अलग से हरी मिर्ची भैया के हाथों में थमाई और बोली:
- काए रे दद्दा…! तैं भूँको हतो ना…?
- हओ री मोड़ी…! भूँक तो लगी है मोहे… आ जा तैं बी एकाध कौंरा खा ले… कहता हुआ परमा कलेवा करने लगा…

और आगे…

उसे जोर की भूख लगी थी; उसने अपना कमर-पट्टा हथियारों समेत उतारकर जमीन पर रख दिया,  दीवार से टिकिकर उकड़ूं बैठ गया और एक के बाद एक, रोटी के कई कौर खा गया।

बिन्नी बोली:
-अरे दद्दा तैं तो खुदई खात जा रहो है… मोहे भूल गओ का…?
परमा के मुँह में रोटी का कौंर अभी भी भरा हुआ था। उसने रोटी चबाते हुए ही एक कौर बिन्न्नी को भी खिला दिया और उससे बोला:
लै री बिन्नी… पकड़ तो जा रोटी… मैं तनक झिरिया में पानी पी आऊँ। कितनी चिरपिरी मिर्ची खबा दई री तैने…।
यह कहकर उसने रोटी बिन्नी के हाथों में रख, लपक कर झिरिया पर पहुँच गया और चुल्लू भर-भर कर पानी पीने लगा।   

बिन्नी कटोरे के आकार की गहरी और मोटी ज्वार की रोटी को हाथों की अंजली बना कर रखे रही, जिसमें प्याज, हरी मिर्च और नमक की छोटी सी गड़िया रखी थी। बिन्नी को अपने भाई का साथ बड़ा अच्छा लगता था। दद्दा का कलेवा अपने हाथ में थामे हुए उसे एक अलौकिक सी अनुभूति हुआ करती थी। हर समय उसे भाई के नज़दीक रहने और उससे चिपटकर बैठने की इच्छा होती रहती थी। उसके अंतर्मन में ऐसे ही कुछ भाव आ जा रहे थे जो उसके बाल मन की समझ से बाहर थे। वह हाथ में रोटी थामे एक टक अपने भाई परमा की ओर देख रही थी… कि कब वह पानी पीकर वापस उसके पास आकर बैठ जाए और कलेवा कर ले।

तभी परमा वापस आ गया और फिर से उसी जगह जमीन पर दीवार से टिककर उकड़ूँ बैठ गया। उसने रोटी बिन्नी से ली तो बिन्नी भी उसकी बाईं भुजा को दौनो हाथों में पकड़ उससे सटकर पालथी मारकर वहीं नीचे बैठ गई। उसने अपना गाल भाई की शक्तिशाली भुजा पर टिका लिया और दूर आसमान के शून्य में निहारने लगी।

माँ बबूल के नीचे खड़ैरा से झाड़ रही थी। उसने शिकार के अवशेषों को एक बड़ी सी टोकरी में भरा और जंगल की ओर फैंकने के लिए बाड़ी के बाहर निकल गई। वह जाते-जाते परमा को आवाज भी लगाते हुए गई:
- ए रे मोड़ा…! सिकार के चारै हिस्सा कबीले के पड़ौसियों के घरों तक पहुंचा दैए… भूलिए नै रे…

माँ के जाने तक परमा का कलेवा हो चुका था। परमा के पिता कोदू नदी की तरफ़ निस्तार के लिए निकल गए थे। परमा उठ कर खड़ा हुआ, उसने दुबारा झिरिया पर जाकर पानी पिया और हाथ-मुंह धोकर वापस बिन्नी पास आकर रुका तो बिन्नी ने उसका कमर-पट्टा उठाकर उसे पकड़ा दिया। पट्टा बांधते हुए परमा नज़दीक खड़ी बिन्नी की ओर ध्यान से देखते हुए विचारमग्न हो गया।

उसे इस बात की चिन्ता सताने लगी कि उसके घर से बाहर निकलने के बाद बिन्नी घर में अकेली रह जायगी। वह बिजली की गति से घर के भीतर गया और बिन्नी का चमड़े का पट्टा, छुरी, हंसिया और नन्हीं सी कुल्हाड़ी लेकर बाहर आ गया। उसने बिन्नी की कमर में पट्टा कसा और उसे छोटे- छोटे हथियारों से लैस कर दिया।

बिन्नी को अपनी मां की तरह शिकारियों और योद्धाओं जैसा शस्त्रों से लैस होना बड़ा अच्छा लगता था। उसने शस्त्रों को धारण करने के बाद अपनी मां की ही तरह कमर सीधी कर आक्रामक मुद्रा बनाने का अभिनय करने लगी। उसका आत्मविश्वास देख कर परमा को संतोष हुआ और उसने शिकार के हिस्से वाली टोकरी उठा ली और बाड़ी के बाहर निकलने के लिए अड़िया की ओर तेजी से बढ़ गया।

बिन्नी अपने भाई को बाड़ी के पीछे अदृष्य होने तक देखती रही और जैसे ही वह आँखों से ओझल हुआ वह फ़ुर्ती से नीम के वृक्ष पर जा चढ़ी जहाँ से बाड़ी के बाहर का विहंगम दृष्य नज़र आता था और कबीले के करीब पच्चीस-तीस घरों की बाड़ियाँ नज़र आती थीं। उसे अपनी दाहिनी ओर खेरमाई की मढ़िया और उसके आगे नदी का घाट दिख रहा था। घाट के दौनों ओर सागौन, खैर, आँवला, आम, जामुन और कीकर-बबूल आदि के सैकड़ों पेड़ खड़े थे जिनके नीचे घनी झाड़ियों और खर-पतवार का सघन जाल फैला हुआ था।

वह पूरा इलाका विन्ध्याचल पर्वत श्रंखलाओं के पूर्वी छोर पर फ़ैले बियाबान जंगलों का एक हिस्सा था, जिसमें लगभग दस-बारह एकड़ के सपाट समतल क्षेत्र में जंगल को साफ़ करके इस कबीले ने नदी के किनारे उपजाऊ जमीन पर अपने बसने के लिए वर्षों पूर्व इस गाँव की स्थापना की थी। बिन्नी की नज़रें लगातार अपने भाई का पीछा कर रही थीं जो एक के बाद एक पड़ौसी घरों में जाकर भोजन वितरित कर रहा था।

परमा ने चौथे और अंतिम घर में भोजन पहुंचाने के बाद ही चैन की साँस ली क्योंकि जहां एक ओर यह कार्य सामाजिक सहयोग और संवेदना बनाए रखने के लिए उपयोगी था वहीं दूसरी ओर यह कबीले के कानून के अंतर्गत भी आता था, जिसकी अवहेलना करने पर कबीले का सरदार और वहां की पंचायत दोषी परिवार के लिए शिकार करने पर प्रतिबंध लगा देते थे। कबीले के लोगों ने वर्षों के अनुभवों के आधार पर यह सीखा था कि जहां एक ओर उनके जीवित रहने के लिए शिकार करना आवश्यक था वहीं दूसरी ओर वन्य जीवन की रक्षा करना भी उनके अस्तित्व के लिए उतना ही ज़रूरी था। यह सब सोचता हुआ परमा अपनी बाड़ी की ओर वापस आ ही रहा था कि तभी उसे हिरन के बच्चे की चीत्कार की आवाज सुनाई दी।

बियाबान जंगल की सुबह के पहले पहर के शांत और निस्तब्ध वातावरण में किसी मृग-शावक का वेदनापूर्ण आर्तनाद जंगल के गगनचुंबी वृक्षों के डाल-पत्तों से प्रतिध्वनित होकर पूरे कबीले के लोगों के कानों को आंदोलित कर गया। पेड़ों पर बैठे हज़ारों पक्षी आतंकित होकर, तीखी आवाज़ें करते हुए और पत्तों से टकराते फड़फड़ाते हुए एक
साथ आकाश में बादलों की भांति छा गए।

परमा घटनास्थल के सबसे नज़दीक मौजूद था और स्वाभाविक रूप से उसी पर इस भयावह दुर्घटना का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा। उसके भीतर छुपा हुआ योद्धा और क्रूर शिकारी एकाएक बाहर आ गया और उसके व्यक्तित्व पर छा गया। पल भर में परमा का चेहरा क्रोध से तमतामाने लगा। उसके शरीर में बिजली सी फ़ुर्ती आ गई और उसका पूरा शरीर शिकारियों की आक्रामक मुद्रा में आ गया। उसके बाँए हाथ की मुट्ठी में भारी-भरकम बांस का धनुष मज़बूती से जकड़ गया और दाहिने हाथ में बैंत का सबसे भारी तीर पीठ पर बंधे तरकश से निकल कर आ गया। 

वह तेज़ी के साथ घायल हिरन की आवाज़ का पीछा करता हुआ घटनास्थल की ओर बढ़ने लगा। उसे संदेह हो रहा था कि किसी तेंदुआ ने हिरन के बच्चे को पकड़ रखा है। उसने स्वयं को उस तेंदुए को निशाना बनाने और उसके चंगुल से शावक को बचाने के लिए पूर्ण रूप से तैयार कर लिया। उसे कुछ पेड़ों के बीच की झाड़ियों के पीछे से सूखे पत्तों पर घायल हिरन के फड़फड़ाने से पैदा हुई, डालों के टूटने और पत्तों के कुचले जाने की आवाज़ आई। परमा के सर, गरदन और आंखे त्वरित गति से घायल हिरन और आक्रामक तेंदुए को खोज में झटके के साथ दाहिने-बाएँ घूमती जा रही थीं।  

उसने अपने कमान पर तीर चढा लिया था और उसे आधा खींच कर सर, गरदन और आंखों के साथ-साथ धनुष को दाहिने-बांए घुमाने लगा था ताकि तेंदुए पर निशाना साधते ही प्रत्यंचा को कानों तक खींच कर तीर छोड़ दे और मृग शावक की जान बचा ले। उसके पैर अपने रास्ते पर चल रहे थे और कमर से ऊपर का पूरा धड़ धनुष के साथ-साथ घूमता जा रहा था। वह नपे-तुले कदमों से तड़पते हुए मृग की ओर बढ़ा। 

हिरन का फड़फड़ाना जारी था और जैसे-जैसे घायल हिरन की आकृति उसकी नज़रों में स्पष्ट होती जा रही थी वैसे-वैसे परमा का चौकन्नापन कम होता जा रहा था। उसे अनुभव होने लगा था कि वह घटना तेंदुए के आक्रमण की नहीं बल्कि कोई अलग प्रकार की दुर्घटना थी। उसने अपने तीर-कमान नीचे कर लिए और दौड़कर घायल हिरन के पास दो तीन छलांगों में पहुंच गया। उसे यह देखकर हैरानी हुई और क्रोध से उसका चेहरा तमतमा गया कि किसी ने अधिक से अधिक दो माह के मृग शावक के दाहिने पुट्ठे पर एक तीर मार दिया था। 

परमा ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर कबीले वालों को आवाज़ लगाई:
- अरे ए… कबीले वालो… दौड़ो… दौड़ो… मिरगा के बच्चा हे मार दओ… मार दओ रे…
उसकी यह पुकार जिसने भी सुनी वह भी यही पुकार लगाने लगा…
- मिरगा के बच्चा हे मार दओ… मार दओ रे…

कुछ ही क्षणों में चारों ओर से यही आवाज़ें आने लगीं। कई लोग ढपले लेकर आ गए और ज़ोर-ज़ोर से ढोल की तरह पीटने लगे। कुछ ही पल में कबीले के लगभग पाँच सौ स्त्री-पुरुष और बच्चे घायल हिरन को घेर कर खड़े हो गए। ढपलों की आवाज़ें लगातार आ रही थीं और वहां मौजूद लोग भी वही पुकार लगाते जा रहे थे
- “मिरगा के बच्चा हे मार दओ… मार दओ रे…”।

इस बीच परमा ने मृग के शरीर से तीर निकाल लिया और उसके घाव को आस-पास के जंगल की झाड़ियों से जड़ी-बूटियां लाकर पत्तों और लताओं की सहायता से बाँध दिया था। घयल हिरन अविचल ज़मीन पर पड़ा हुआ था और उसके घायल पैर में रह-रह कर कंपन हो रहा था। घाव अधिक गहरा नहीं था पर कबीले के किसी निवासी ने हिरन के बच्चे पर बेवजह  हमला करने का जघन्य अपराध कर दिया था जिसकी सज़ा भी उतनी ही कड़ी हो सकती थी जितनी किसी आदमी पर जानलेवा हमला करने की हुआ करती थी। 

कबीले वालों को ढपले पीटना और पुकार लगाना तब तक जारी रखना आवश्यक था जब तक कि कबीले का सरदार घटनास्थल पर नहीं पहुंच जाता, और घायल जानवर का मुआयना नहीं कर लेता। सरदार के आने तक घटनास्थल से सभी बच्चों को दूर भेज देना भी आवश्यक था; क्योंकि कभी-कभी सरदार घटनास्थल पर ही हिंसक सज़ाएं दे दिया करता था जिन्हें देखकर बच्चों का मानसिक संतुलन बिगड़ने की पूरी संभावना हुआ करती थी। सरदार के आने तक यदि अपराधी को उसके सामने पेश करने के लिए पकड़कर तैयार रखा जाता था तो सरदार खुश होता था। किंतु अगर तब तक अपराधी नहीं पकड़ा जाता तो सरदार घटनास्थल पर मौजूद लड़ाकों में से किसी भी व्यक्ति को भी सज़ा सुना सकता था।

परंतु इसके बावजूद सबसे भयानक सजा दी जाती थी उस अपराधी को जो सरदार के घटनास्थल पर पहुंचने से पहले स्वयं को वहां मौजूद लड़ाकों के हवाले नहीं किया करता था। परमा का पिता कोदू सरदार के लड़ाकों में से एक था, जो वहां परमा की पहली पुकार पर ही पहुंच गया था। उसे मिलाकर वहाँ करीब सौ लड़ाके अस्त्र-शस्त्र से लैस पहुंच चुके थे जो जगल में खूँख्वार भेड़ियों की तरह अपराधी की खोज में कुल्हाड़ियों और पाठलों से झाड़ियों को तहस नहस करते हुए चारों ओर फ़ैलते जा रहे थे। इन लड़ाकू पुरुषों के अलावा परमा की माँ सहित करीब पचास लड़ाकू स्त्रियां भी वहाँ तैनात थीं जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर किसी भी युद्ध, आक्रमण या अन्य हिंसक कार्यवाही के लिए तैयार रहना था।

परमा और कुछ अन्य नवयुवक घायल हिरन के बछड़े की देखभाल में लगे हुए थे और कबीले के आम लोग बार-बार पीछे मुड़ मुड़ कर देख रहे थे और सरदार के आने के बाद की होने वाली कार्यवाहियों का अंदाज़ा लगा रहे थे। उनके मन में उत्सुकता, आशंका और भय के मिले-जुले भाव तैर रहे थे। कोई नहीं जनता था कि हिरन के बछड़े को घायल करने की गलती किससे हुई होगी और इस जघन्य अपराध की उसे क्या सज़ा दी जाने वाली है। 

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शेष अगले अंक में क्रमश...
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Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
Opening Page:  Preface:  Introduction:  Episode-1:  Episode-2:  Episode-3:  Episode-4:  Episode-5:  Episode-6:  Episode-7:  Episode-8:  Episode-9: Episode-10: : Episode-11: Episode-12: Episode-13; Episode-14  
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Synonyms of Hindi words:
चिरपिरी मिर्ची= hot chilly; कटोरे= bowls; अलौकिक= devine; अंतर्मन= inner self; खड़ैरा= broom made of dried bushy plants; आत्मविश्वास ; उपजाऊ= fertile; सहयोग= cooperation ; सामाजिक= social; संवेदना= sensitivity; कानून= law; प्रतिबंध= restriction; वन्य जीवन= wild life; अस्तित्व= existence; निस्तब्ध= silent, tranquil; गगनचुंबी= sky high; प्रतिध्वनित= echoing; क्रूर= cruel; बैंत= cane; त्वरित= quick, abrupt; आक्रामक= aggressive; मिरगा= deer; ढपले= drum; जड़ी-बूटियां= herbs; अविचल= unmoved; जघन्य अपराध= serious crime; सरदार= chief; हिंसक सज़ाएं= cruel punishments; मानसिक संतुलन= mental balance; लड़ाकों= fighters
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Caution: This creative work has been originally written by the author Harish Jharia who is the sole owner of the text and this intellectual property. This has been published on the personal Blog “Discover Life” of Harish Jharia at the URL: http://harishjhariasblog.blogspot.com/. No hyperlink to this novel “Patthar ki Ibaarat” (Script of Stone) has been provided nor any permission granted to any person, organization or site whomsoever, by the writer and owner of the copyright of this novel that is Harish Jharia. This novel has been published on the blog “Discover Life” for the visitors to this blog for their healthy reading and intellectual entertainment. The novel in whole, in part or as extracts should not be copied and or reproduced neither on internet, nor written on CDs nor printed on books, magazines newspapers and or in any media.  - Harish Jharia
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Disclaimer: This is a work of fiction and all the characters, story, incidents, culture, social life, evolution, developments etc are all imaginary.  This article / Story / fiction is written based on my personal observations and imagination. My intention for publishing the same is to provide healthy reading and intellectual entertainment and not for educating the visitors. Names of people, societies, communities and description of faiths, beliefs, incidents are imaginary and fictitious. They have neither any relevance to the prevailing entities and traditions nor have any similarities with ongoing lifestyles, political ideologies and legal doctrines. The contents of this creative work have not been written with any intention to criticize, condemn or oppose anything what-so-ever present in reality in any country in the world. No literature or authentic books have been referred for writing the contents of this article. The visitors are advised not to refer the contents of this article for any research or testimony on scientific, geographical, political, civic, social or legal purposes. The visitors are further advised to consult relevant experts before adapting any information from this article. The author or the website are not responsible for any errors, mistakes, or omissions there in. - Harish Jharia
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npad

23 January 2010

eNovel:Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone): Episode- 3


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उपन्यास: पत्थर की इबारत, एपीसोड- 3

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पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ…

 कहकर उसने केले के पत्तों में लिपटा भोजन एक बांस की टोकरी मे रख लिया और पलटर घर के अण्डाकार दरवाज़े की ओर देखने लगा। उसे कसकर भूख लग आई थी और वह प्रतीक्षा कर रहा था कि कब उसकी माई ‘नौनी’ उसे आवाज़ दे या बहन ‘बिन्नी’ हाथ में बासी रोटी, नमक की गड़िया और प्याज की गांठ लेकर भागती हुई आ जाए…

और आगे…

वर्षाकाल के ठीक बाद की हरियाली चारों ओर फ़ैली हुई थी। गौरैया चिड़ियों का एक झुंड झिरिया के किनारों पर उतरकर पानी पी रहा था। उनके चहचहाने की महीन और मधुर आवाज़ सुन एक पल के लिए परमा ने उस तरफ़ देखा तभी उसके कानों में माई की आवाज़ आई:

- ए…ए…ए… परमू! कहाँ जा रहो है रे…? कलेबा तो कर लै।

परमा ने पलट कर माई की ओर देखा। उसकी माई नौनी अपनी बेटी बिन्नी के साथ बाड़ी पर लगा भारी अड़िया हटाकर घर के परकोटे में प्रवेश कर रही थी। नौनी का कद आम औरतों से कहीं ऊँचा था। एक सम्पूर्ण नारी की गरिमा, कोमलता और  सुंदर सुघड़ काया के साथ शक्तिशाली, पुष्ट और चपल शरीर ने उसकी चाल में एक अविश्वसनीय आकर्षण पैदा कर दिया था। वह लम्बे-लम्बे डग भरती हुई अपने इकलौते बेटे की ओर तेज़ी से बढ़ती आ रही थी और बेटी बिन्नी उसकी चाल को मिलाने के लिए उसके आगे-आगे दौड़ रही थी।

नौनी के कमर तक लंबे बाल नदी से नहाकर लौटने तक कुछ-कुछ भीगे-भीगे से थे। बालों की एक लट उसकी बड़ी-बड़ी आँखों के आगे से झूलती हुई एक गाल पर चिपक गई थी। उसके लंबे-लंबे बाल सुबह की बयार में कधों के आगे तक बिखर रहे थे। पलकों की लंबी-लंबी बिरौनियां आंख झपकने के साथ हर बार पर ऊंची कमान सी भवों को छू लेती थीं।  वह बार-बार बालों की लटों को एक हाथ से अपने कानों के पीछे दबाने कि असफल कोशिश कर रही थी। दूसरे हाथ में उसने बांस की एक टोकरी में धुले हुए भीगे कपड़े कोहनी से दबाए हुए थे। शरीर के ऊपरी भाग को उसने सूती कपड़े से ढंका हुआ था। नौनी ने एक लंबे अंगोछे के दौनों छोरों को गरदन के पीछे से बराबर दो भागों में आगे की ओर लाकर बाईं ओर का छोर दाहिनी ओर और दाहिनी ओर का बाईं ओर ले जाते हुए अंगोछे के दौनों छोरों को कमर पर पीछे की ओर एक बड़ी सी सरफूंद में बांध दिया था। इस प्रकार नौनी ने एक सूती अंगोछे को एक खूबसूरत चोली का आकार दे दिया था।

नौनी ने कमर से लेकर घुटनों तक एक अलग सूती धोती कांच लगाकर कस कर बांधी हुई थी। धोती के ऊपर चमड़े के पट्टे का कमरबंध कसा हुआ था जिसमें एक ओर तेज छुरी और हंसिया खुसा हुआ था और दूसरी ओर एक हल्की कुल्हाड़ी का लंबा हत्था लटक रहा था। हाथ और पैर की उंगलियों में डेढ़ अंगुल लंबे सख्त, मजबूत और नुकीले नाखून थे और पैर के पंजे और तलवे सख्त और मोटी त्वचा से ढके हुए थे। कुल मिलाकर नौनी भी अपने पति और बेटे की तरह एक सम्पूर्ण शिकारी योद्धा ही थी जिसमें अपनी सुरक्षा करने के लिए चौकन्नापन और शत्रु से आकस्मिक युद्ध और आक्रमण करने के लिए शारीरिक योग्यताएं, युद्धकलाएं, चपलता और साहस मौजूद थे।

नौनी अच्छी तरह जानती थी कि सूरज निकलने से पहले ही उसका बेटा शिकार पर निकल गया था। अब तक पहली पहर का सूरज काफ़ी ऊपर तक आ चुका था और माई  को इस बात का एहसास हो रहा था कि उसके बेटे को अवश्य ही जोर की भूख लग आई होगी। उसके चेहरे पर ममता पूर्ण संवेदना झलक आई और उसने परमा के पास जाकर उसके गाल पर अपना हाथ रख दिया और कहा:
- काए रे परमा …! भूँको है का…?
- हओ री माई… कह कर उसने बहन बिन्नी के सर पर हाथ रख उसके बालों को सहलाने लगा।
माई ने बिन्नी से कहा:
- एरी मोड़ी…! जा तो बारी में सें एकाध मिर्ची टोड़ ला। मैं तोरे दद्दा के लाने रोटी लै कें आत हौं।

कहकर नौनी ने हाथ की टोकरी नीचे पर रखी और एक पल में, लबे-लंबे डग भरती हुई, घर के अण्डाकार दरवाजे पर पहुंच गई। उसने परछी के खंभे को हाथों से जकड़ कर पकड़ा और दौनों पैरों को एक साथ हवा में उछाल कर दरवाजे के भीतर कूद गई। 

भीतर से घर का आकार गोलाकार था जो करीब बीस हाथ चौड़े व्यास में फैला हुआ था। घर के बीचों-बीच आदमी की जंघा बराबर मोटा सगौना का मजबूत खंभा गड़ा हुआ था जिसके ऊपरी छोर पर घर के छप्पर का पूरा भार टिका हुआ था। तीन-चार हाथ मोटी, बारह हाथ ऊंची छुई से पुती सफ़ेददीवारों के ऊपर एक हाथ ऊंचा रोशनदान हवा और प्रकाश आने के लिए चारों ओर छोड़ दिया गया था। उसके ऊपर खड़े मलगों के छोरों पर घास और ताड़ के डक्खों का छप्पर टिका हुआ था। गोलाकार दीवार पर चारों ओर जानवरों की फ़रवाली खालें लकड़ी की खूँटियों से लटकी हुई थीं। एक ओर छप्पर के मलगों से रस्सियों के सहारे झूलती लकड़ी की मचान पर भाले, तलवार, पाठल और गँड़ासे आदि हथियार करीने से सहेजकर रखे हुए थे।

घर का कच्ची मिट्टी का फ़र्श कूट-पीट और घिस कर चिकना, कठोर, मजबूत और सीलन अवरोधक बनाया गया था। आधे के करीब फ़र्श पर परिवार के सोने के लिए करीने से पेंयार फैलाई गई थी और उसपर जानवरों की मुलायम खाल बिछाई हुई थी। घर के दूसरे छोर पर हाथ की बनाई हुई मिट्टी की चार कुठियाँ  थीं जिनमें अनाज भरा हुआ था। उन्हीं के नज़दीक मिट्टी के काले बर्तन, हंड़िया, परैया, पैना, कल्ला आदि रखे हुए और एक रस्सी से सींका झूल रहा था जिसमें रखी परैया में रात की बासी रोटी रखी हुई थीं।

नौनी ने सींके से एक ज्वार की रोटी निकाली, उसी पर एक प्याज की गाँठ और छोटी सी नमक की डलिया रख ली और उसे लेकर अण्डाकार दरवाज़े से बाहर आ गई। घर की बाहरी दीवार से टिक कर परमा बैठा हुआ कलेवा की प्रतीक्षा कर रहा था। बिन्नी हाथ में एक हरी मिर्च पकड़े परमा से टिक कर खड़ी थी और दरवाजे की ओर देख रही थी। माई को देखते ही वह दौड़कर उसके पास आई और उसके हाथ से रोटी लेकर अपने दद्दा के पास आई और कलेवा उसके हाथ पर रख दिया। फ़िर अलग से हरी मिर्ची भैया के हाथों में थमाई और बोली:
- काए रे दद्दा…! तैं भूँको हतो ना…?
- हओ री मोड़ी…! भूँक तो लगी है मोहे… आ जा तैं बी एकाध कौंरा खा ले… कहता हुआ परमा कलेवा करने लगा।

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शेष अगले अंक में क्रमश…
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Synonyms of Hindi words:
संवेदना= compassion; मोड़ी= small girl;  अण्डाकार= oval; परछी= shed; खंभे= pillars; व्यास= diameter; जंघा= thy;  सगौना= Teak wood;  डक्खों= palm leaf;  खालें= tanned leather;  खुटियों= wooden pegs; मचान= elevated wooden platform; भाले= speer;  तलवार= sword; पाठल= heavy chopper, गँड़ासे= grass chopper; पेंयार= dried paddy plants; कुठियां= urns for grains; हंड़िया= terracota pan; परैया= terracota lid; पैना= Terracota pot with a hole in the bottom;  कल्ला= terracota hot plate; सींका: hanging shelf; बासी= food cooked previous day; चपल= swift; सुघड़= beautifully formed; कद= height; आकर्षण= attraction; सुघड़= beautifully formed; चपल= swift; परकोटे= boundry; माई= mom; कलेबा= breakfast; महीन और मधुर= Soft and sweet; गौरैया= sparrow  ; टोकरी= bamboo tray ; केले के पत्तों= banana leaf; गांठ= knot : गड़िया: cryatal  ;शिकार= prey; आभा= splendor; खेरमाई= goddess of village territory; मढ़िया= small temple; छप्पर= roof; ताड़= palm; ढाल= slope; परछी= shed; बल्लियों, मलगे = wooden logs; धांसकर= rammed into; खम्भों= pillars; करेले- bitter gourd; बेलें= creeper; पंजर= skeleton; झौंपड़ा= thatched hut; बांस= bamboo; टटिया= bamboo-mesh; अंधड़ों= strong wind; परोसने= serving food; खूरने= stir; कड़छी= serving spoon; चटुआ= wooden spatula; कल्ला= earthen pan; पृष्ठभूमि= background; पहाड़ी= hill; झरना= spring; सोते= cascade; बया= Indian tailor bird; अड़िया= wooden-log barrior, लोमड़ियां= fox; बबूल= Egyptian thorn, prickly acacia
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Caution:
This creative work has been originally written by the author Harish Jharia who is the sole owner of the text and this intellectual property. This has been published on the personal Blog “Discover Life” of Harish Jharia at the URL: http://harishjhariasblog.blogspot.com/. No hyperlink to this novel “Patthar ki Ibaarat” (Script of Stone) has been provided nor any permission granted to any person, organization or site whomsoever, by the writer and owner of the copyright of this novel that is Harish Jharia. This novel has been published on the blog “Discover Life” for the visitors to this blog for their healthy reading and intellectual entertainment. The novel in whole, in part or as extracts should not be copied and or reproduced neither on internet, nor written on CDs nor printed on books, magazines newspapers and or in any media. - Harish Jharia
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Disclaimer:
This is a work of fiction and all the characters, story, incidents, culture, social life, evolution, developments etc are all imaginary.  This article / Story / fiction is written based on my personal observations and imagination. My intention for publishing the same is to provide healthy reading and intellectual entertainment and not for educating the visitors. Names of people, societies, communities and description of faiths, beliefs, incidents are imaginary and fictitious. They have neither any relevance to the prevailing entities and traditions nor have any similarities with ongoing lifestyles, political ideologies and legal doctrines. The contents of this creative work have not been written with any intention to criticize, condemn or oppose anything what-so-ever present in reality in any country in the world. No literature or authentic books have been referred for writing the contents of this article. The visitors are advised not to refer the contents of this article for any research or testimony on scientific, geographical, political, civic, social or legal purposes. The visitors are further advised to consult relevant experts before adapting any information from this article. The author or the website are not responsible for any errors, mistakes, or omissions there in.
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20 January 2010

Indian Railways: discouraging conditions through Common Man’s Eye:

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 © Harish Jharia


In 1960s, Indian railways had three classes. The 3rd class was for common people 2nd class for middle classes and 1st class for the higher classes.


I remember my childhood railway journeys when our family used to travel in 3rd class couches, that had wooden benches to sit or sleep and windows wide open without iron grills. There was no system of berths and reservations. Travelers used to buy tickets and board the train and travel long journeys, just like that.


My dad used to lift me up in his arms and push me through windows right on the wooden benches in the couches with instructions to capture as much place as required for our family. Similarly, we used to load our luggage through the windows and later my dad used to stack all the pieces on the upper berth.


We children felt quite excited all through our journeys. We enjoyed the puffing sound of steam engine, the loud shrill sound of whistle and the mixed smell of steam and smoke that gushed in the couch through windows.


I traveled in 2nd class for the first time when I went to Bangalore for my SSB interview in 1964. The class of my travel successively elevated with the passage of time and so were the technology, quality and facilities in trains.


In 1970s, the journey between Jabalpur and Dehradun was so hectic to accomplish. We had to travel in the first train from Dehradun to Delhi, secondly from Delhi to Bina in another train and finally from Bina to Jabalpur in the third. There were long waiting hours on each railway junction with minimal facilities for food and water.


Today the Indian railways are one of the best setups in the world. We have fast and super-fast long distance trains, with facilities of air-conditioning, catering and online reservations. We have the best possible infrastructure in the world, on which the railways have invested billions of rupees from the people’s treasury. In spite of all this the users are dissatisfied, frustrated and most of the times feel cheated and exploited.


The main reasons for the denial of expected facilities to the users, for which they pay, are rampant mismanagement, negligence in maintenance, corruption and inefficiency of employees.


The Indian Institute of Management (IIM), Ahmedabad, had invited the Railway Minister for delivering lectures on management to their students. It is a testimony of expertise of the minister in the field of management. Nevertheless, you would hardly believe on IIM’s perspective if you look at the way the Ministry Of Railways manages Indian Railways. The following are the areas where Indian Railway’s mismanagement, negligence in maintenance, corruption and inefficiency of employees is apparently perceptible:

  1. Overall condition of trains are bad… broken, dilapidated, vulnerable
  2. Condition of tracks are bad… lose, uneven
  3. Cleanliness in trains and stations is not satisfactory
  4. Quality of fittings in the compartment and in toilets are poor
  5. Quality of repairs and servicing on interiors is poor
  6. Cleanliness on tracks and yards is drastically poor
  7. Most of the trains do not have catering facility
  8. attendants and housekeeping staff do not wear uniform and name tags
  9. A / Cs are miss-operated by untrained staff
  10. Users have to pay bribe for ‘tatkal’ reservations
  11. Users have to pay bribe for ‘wait list’ and ‘RAC’ conformations
  12. Unauthorized private vendors sell tea and snacks in A / C couches
  13. Trains do not run on time
  14. There is no control on unauthorized boarding by politicians and their accomplices
  15. Quality of food served in running trains is poor
  16. Complaint book is not readily available

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 - Harish Jharia 
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